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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 18

75 Sukta
31 Mantra
6/47/18
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
रू॒पंरू॑पं॒ प्रति॑रूपो बभूव॒ तद॑स्य रू॒पं प्र॑ति॒चक्ष॑णाय। इन्द्रो॑ मा॒याभिः॑ पुरु॒रूप॑ ईयते यु॒क्ता ह्य॑स्य॒ हर॑यः श॒ता दश॑ ॥१८॥

रू॒पम्ऽरू॑पम् । प्रति॑ऽरूपः । ब॒भू॒व॒ । तत् । अ॒स्य॒ । रू॒पम् । प्र॒ति॒ऽचक्ष॑णाय । इन्द्रः॑ । मा॒याभिः॑ । पु॒रु॒ऽरूपः॑ । ई॒य॒ते॒ । यु॒क्ताः । हि । अ॒स्य॒ । हर॑यः । श॒ता । दश॑ ॥

Mantra without Swara
रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय। इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश ॥

रूपम्ऽरूपम्। प्रतिऽरूपः। बभूव। तत्। अस्य। रूपम्। प्रतिऽचक्षणाय। इन्द्रः। मायाभिः। पुरुऽरूपः। ईयते। युक्ताः। हि। अस्य। हरयः। शता। दश ॥१८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 33 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) जीव (मायाभिः) बुद्धियों से (प्रतिक्षणाय) प्रत्यक्ष कथन के लिये (रूपंरूपम्) रूप-रूप के (प्रतिरूपः) प्रतिरूप अर्थात् उसके स्वरूप से वर्त्तमान (बभूव) होता है और (पुरुरूपः) बहुत शरीर धारण करने से अनेक प्रकार का (ईयते) पाया जाता है (तत्) वह (अस्य) इस शरीर का (रूपम्) रूप है और जिस (अस्य) इस जीवात्मा के (हि) निश्चय करके (दश) दश सङ्ख्या से विशिष्ट और (शता) सौ सङ्ख्या से विशिष्ट (हरयः) घोड़ों के समान इन्द्रिय अन्तःकरण और प्राण (युक्ताः) युक्त हुए शरीर को धारण करते हैं, वह इसका सामर्थ्य है ॥१८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! बिजुली पदार्थ के प्रति तद्रूप होती है, वैसे ही जीव शरीर-शरीर के प्रति तत्स्वभाववाला होता है और जब बाह्य विषय के देखने की इच्छा करता है, तब उसको देख के तत्स्वरूपज्ञान इस जीव को होता है और जो जीव के शरीर में बिजुली के सहित असङ्ख्य नाड़ी हैं, उन नाड़ियों से यह सब शरीर के समाचार को जानता है ॥१८॥
Subject
फिर यह जीवात्मा कैसा होता है, इस विषय को कहते हैं ॥