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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 17

75 Sukta
31 Mantra
6/47/17
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
परा॒ पूर्वे॑षां स॒ख्या वृ॑णक्ति वि॒तर्तु॑राणो॒ अप॑रेभिरेति। अना॑नुभूतीरवधून्वा॒नः पू॒र्वीरिन्द्रः॑ श॒रद॑स्तर्तरीति ॥१७॥

परा॑ । पूर्वे॑षाम् । स॒ख्या । वृ॒ण॒क्ति॒ । वि॒ऽतर्तु॑राणः । अप॑रेभिः । ए॒ति॒ । अन॑नुऽभूतीः । अ॒व॒ऽधू॒न्वा॒नः । पू॒र्वीः । इन्द्रः॑ । श॒रदः॑ । त॒र्त॒री॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति। अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्वीरिन्द्रः शरदस्तर्तरीति ॥

परा। पूर्वेषाम्। सख्या। वृणक्ति। विऽतर्तुराणः। अपरेभिः। एति। अननुऽभूतीः। अवऽधून्वानः। पूर्वीः। इन्द्रः। शरदः। तर्तरीति ॥१७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 33 Mantra » 2

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Meaning
जो सूर्य्य के सदृश (इन्द्रः) राजा (पूर्वेषाम्) पूर्वजनों के (सख्या) मित्र से (वितर्त्तुराणः) विशेष करके अत्यन्त हिंसा करता और (अनानुभूतीः) अनुभव से रहित जनों को (अवधून्वानः) नीचे को कम्पाता हुआ (परा, वृणक्ति) त्यागता है और (अपरेभिः) अन्यों के साथ (एति) जाता है वह जैसे सूर्य्य (पूर्वीः) प्राचीन (शरदः) शरद् आदि ऋतुओं को, वैसे वर्षों के (तर्तरीति) अत्यन्त पार होता है ॥१७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा वृद्ध जनों के मित्रपन का त्याग करके नीच मित्रों को प्राप्त होता है, वह कल्याण से च्युत होता है और जो अनभिज्ञ मित्रों का त्याग करके अभिज्ञों को मित्र करता है, वही पूर्ण आयु भर सुख से पार होता है ॥१७॥
Subject
फिर वह राजा क्या नहीं करके क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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