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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 16

75 Sukta
31 Mantra
6/47/16
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शृ॒ण्वे वी॒र उ॒ग्रमु॑ग्रं दमा॒यन्न॒न्यम॑न्यमतिनेनी॒यमा॑नः। ए॒ध॒मा॒न॒द्विळु॒भय॑स्य॒ राजा॑ चोष्कू॒यते॒ विश॒ इन्द्रो॑ मनु॒ष्या॑न् ॥१६॥

शृ॒ण्वे । वी॒रः । उ॒ग्रम्ऽउ॑ग्रम् । द॒म॒ऽयन् । अ॒न्यम्ऽअ॑न्यम् । अ॒ति॒ऽने॒नी॒यमा॑नः । ए॒ध॒मा॒न॒ऽद्विट् । उ॒भय॑स्य । राजा॑ । चो॒ष्कू॒यते॑ । विशः॑ । इन्द्रः॑ । म॒नु॒षया॑न् ॥

Mantra without Swara
शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः। एधमानद्विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान् ॥

शृण्वे। वीरः। उग्रम्ऽउग्रम्। दमऽयन्। अन्यम्ऽअन्यम्। अतिऽनेनीयमानः। एधमानऽद्विट्। उभयस्य। राजा। चोष्कूयते। विशः। इन्द्रः। मनुष्यान् ॥१६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 33 Mantra » 1

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Meaning
हे मन्त्री जनो ! जो (वीरः) शूरता आदि गुणों से युक्त जन (उग्रमुग्रम्) तेजस्वी तेजस्वी जन को (दमायन्) इन्द्रियों का निग्रह कराता हुआ और (अन्यमन्यम्) दूसरे दूसरे को (अतिनेनीयमानः) अत्यन्त न्याय की व्यवस्था को प्राप्त कराता हुआ (एधमानद्विट्) वृद्धि को प्राप्त होते हुओं से द्वेष करनेवाला और (उभयस्य) राजा तथा प्रजाजन समुदाय का (राजा) न्याय और विनय से प्रकाशमान राजा (इन्द्रः) विद्या और विनय को धारण करनेवाला (विशः, मनुष्यान्) प्रजाजनों को (चोष्कूयते) निरन्तर पुकारता है, उसको मैं न्यायेश (शृण्वे) सुनता हूँ ॥१६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो मनुष्य दुष्टों-दुष्टों को ताड़न करता, श्रेष्ठों-श्रेष्ठों का सत्कार करता, अन्य की वृद्धि देख कर द्वेष करनेवालों को दण्ड देता और प्रसन्नों का सत्कार करता हुआ सम्पूर्ण वादी और प्रतिवादी के वचनों को यथावत् सुन के सत्य न्याय को करता है, वही राजा होने के योग्य है ॥१६॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

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