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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 15

75 Sukta
31 Mantra
6/47/15
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क ईं॑ स्तव॒त्कः पृ॑णा॒त्को य॑जाते॒ यदु॒ग्रमिन्म॒घवा॑ वि॒श्वहावे॑त्। पादा॑विव प्र॒हर॑न्न॒न्यम॑न्यं कृ॒णोति॒ पूर्व॒मप॑रं॒ शची॑भिः ॥१५॥

कः । ई॒म् । स्त॒व॒त् । कः । पृ॒णा॒त् । कः । य॒जा॒ते॒ । यत् । उ॒ग्रम् । इत् । म॒घऽवा॑ । वि॒श्वहा । अवे॑त् । पादौ॑ऽइव । प्र॒ऽहर॑न् । अ॒न्यम्ऽअ॑न्यम् । कृ॒णोति॑ । पूर्व॑म् । अप॑रम् । शची॑भिः ॥

Mantra without Swara
क ईं स्तवत्कः पृणात्को यजाते यदुग्रमिन्मघवा विश्वहावेत्। पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः ॥

कः। ईम्। स्तवत्। कः। पृणात्। कः। यजाते। यत्। उग्रम्। इत्। मघऽवा। विश्वहा। अवेत्। पादौऽइव। प्रऽहरन्। अन्यम्ऽअन्यम्। कृणोति। पूर्वम्। अपरम्। शचीभिः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 32 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! इस संसार में (कः) कौन (ईम्) प्राप्त होने योग्य परमात्मा की (स्तवत्) स्तुति करे और (कः) कौन सबका (पृणात्) पालन करे (कः) कौन सत्य का (यजाते) यजन करे कि (यत्) जो (मघवा) बहुत धनवाला (शचीभिः) कर्म्मों से (विश्वहा) सब दिन (उग्रम्) तेजस्वी (इत्) ही की (अवेत्) रक्षा करे तथा (पादाविव) चरणों को जैसे वैसे (अन्यमन्यम्) दूसरे-दूसरे को (प्रहरन्) मारता हुआ (पूर्वम्) पहिलेवाले को (अपरम्) पीछे (कृणोति) करता है ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो ! हम लोग आप लोगों से पूछते हैं कि इस संसार में कौन ईश्वर की प्रशंसा करता, कौन सब का न्याय से पालन करता और कौन विद्वानों का सत्कार करता है, इन प्रश्नों का क्रम से उत्तर-जो विद्या के योग से धन से युक्त है, वह सर्वदा परमेश्वर ही की स्तुति करता है और जो न्यायकारी राजा पक्षपात का त्याग कर अपराधी को दण्ड देता और धार्मिक का सत्कार करता है, वह सर्वरक्षक है और जो स्वयं विद्वान् गुण और दोषों का जाननेवाला है, वही विद्वानों का सत्कार करने योग्य है, ये उत्तर हैं ॥१५॥
Subject
फिर कौन किनसे पूछें और समाधान करें, इस विषय को कहते हैं ॥