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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 14

75 Sukta
31 Mantra
6/47/14
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अव॒ त्वे इ॑न्द्र प्र॒वतो॒ नोर्मिर्गिरो॒ ब्रह्मा॑णि नि॒युतो॑ धवन्ते। उ॒रू न राधः॒ सव॑ना पु॒रूण्य॒पो गा व॑ज्रिन्युवसे॒ समिन्दू॑न् ॥१४॥

अव॑ । त्वे इति॑ । इ॒न्द्र॒ । प्र॒ऽवतः॑ । न । ऊ॒र्मिः । गिरः॑ । ब्रह्मा॑णि । नि॒ऽयुतः॑ । ध॒व॒न्ते॒ । उ॒रु । न । राधः॑ । सव॑ना । पु॒रूणि॑ । अ॒पः । गाः । व॒ज्रि॒न् । यु॒व॒से॒ । सम् । इन्दू॑न् ॥

Mantra without Swara
अव त्वे इन्द्र प्रवतो नोर्मिर्गिरो ब्रह्माणि नियुतो धवन्ते। उरू न राधः सवना पुरूण्यपो गा वज्रिन्युवसे समिन्दून् ॥

अव। त्वे इति। इन्द्र। प्रऽवतः। न। ऊर्मिः। गिरः। ब्रह्माणि। निऽयुतः। धवन्ते। उरु। न। राधः। सवना। पुरूणि। अपः। गाः। वज्रिन्। युवसे। सम्। इन्दून् ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 32 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वज्रिन्) शस्त्र और अस्त्रों से युक्त (इन्द्र) राजन् ! जो (त्वे) आप में (नियुतः) निश्चित सत्यवाद जिनमें ऐसी (गिरः) श्रेष्ठ वाणियाँ (ब्रह्माणि) धनों वा अन्नों को और (प्रवतः) निम्नों को (ऊर्मिः) लहर (न) जैसे वैसे (अव, धवन्ते) चलाती हैं और (उरू) बहुत (राधः) धनों को (न) जैसे वैसे (पुरूणि) बहुत (सवना) प्रेरणायें प्राप्त होती हैं और जिस कारण (अपः) जलों (गाः) भूमि वा वाणियों को और (इन्दून्) आनन्दों को (सम्) (युवसे) संयुक्त करते हो, इससे आप श्रेष्ठ हो ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो ब्रह्मचर्य्य आदि श्रेष्ठ कर्मों को करते हैं, उनको नीचे के स्थान को जल जैसे और पुरुषार्थी को लक्ष्मी जैसे वैसे सम्पूर्ण विद्या, सम्पूर्ण ऐश्वर्य और सम्पूर्ण आनन्द प्राप्त होते हैं ॥१४॥
Subject
फिर उस राजा का कौन गुण सेवन करते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥