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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 12

75 Sukta
31 Mantra
6/47/12
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इन्द्रः॑ सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ अवो॑भिः सुमृळी॒को भ॑वतु वि॒श्ववे॑दाः। बाध॑तां॒ द्वेषो॒ अभ॑यं कृणोतु सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम ॥१२॥

इन्द्रः॑ । सु॒ऽत्रामा॑ । स्वऽवा॑न् । अवः॑ऽभिः । सु॒ऽमृ॒ळी॒कः । भ॒व॒तु॒ । वि॒श्वऽवे॑दाः । बाध॑ताम् । द्वेषः॑ । अभ॑यम् । कृ॒णो॒तु॒ । सु॒ऽवीर्य॑स्य । पत॑यः । स्या॒म॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः। बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम ॥

इन्द्रः। सुऽत्रामा। स्वऽवान्। अवःऽभिः। सुऽमृळीकः। भवतु। विश्वऽवेदाः। बाधताम्। द्वेषः। अभयम्। कृणोतु। सुऽवीर्यस्य। पतयः। स्याम ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 32 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सुत्रामा) उत्तम प्रकार रक्षा करनेवाला (स्ववान्) बहुत अपने जन विद्यमान जिसके ऐसा (विश्ववेदाः) सम्पूर्ण विज्ञान को जाननेवाला (इन्द्रः) दुष्टता का नाश करनेवाला (अवोभिः) रक्षण आदि से हम लोगों का (सुमृळीकः) उत्तम प्रकार सुख करनेवाला (भवतु) हो तथा (द्वेषः) आदि दोषों से युक्त जनों का (बाधताम्) निवारण करे और (अभयम्) निर्भयपन (कृणोतु) करे, उस (सुवीर्यस्य) सुन्दर पराक्रम वा ब्रह्मचर्य्यवाले के हम लोग (पतयः) पालन करनेवाले स्वामी (स्याम) होवें, उसके रक्षक आप लोग भी हूजिये ॥१२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो राजा सम्पूर्ण विद्या और किये हुए पूर्ण ब्रह्मचर्य्य से युक्त बहुत मित्रोंवाला और अपने सदृश श्रेष्ठ का रक्षक, दुष्टों को दण्ड देनेवाला, सब प्रकार से निर्भयता करता है, उसकी रक्षा सब को चाहिये कि सब प्रकार से करें ॥१२॥
Subject
फिर वह कैसा हो और उसकी रक्षा कौन करें, इस विषय को कहते हैं ॥