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Rigveda Mandal 6 / Sukta 47 / Mantra 11

75 Sukta
31 Mantra
6/47/11
Devata- इन्द्र: Rishi- गर्गः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रा॒तार॒मिन्द्र॑मवि॒तार॒मिन्द्रं॒ हवे॑हवे सु॒हवं॒ शूर॒मिन्द्र॑म्। ह्वया॑मि श॒क्रं पु॑रुहू॒तमिन्द्रं॑ स्व॒स्ति नो॑ म॒घवा॑ धा॒त्विन्द्रः॑ ॥११॥

त्रा॒तार॑म् । इन्द्र॑म् । अ॒वि॒तार॑म् । इन्द्र॑म् । हवे॑ऽहवे । सु॒ऽहव॑म् । शूर॑म् । इन्द्र॑म् । ह्वया॑मि । श॒क्रम् । पु॒रु॒ऽहू॒तम् । इन्द्र॑म् । स्व॒स्ति । नः॒ । म॒घऽवा॑ । धा॒तु॒ । इन्द्रः॑ ॥

Mantra without Swara
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्। ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रं स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः ॥

त्रातारम्। इन्द्रम्। अवितारम्। इन्द्रम्। हवेऽहवे। सुऽहवम्। शूरम्। इन्द्रम्। ह्वयामि। शक्रम्। पुरुऽहूतम्। इन्द्रम्। स्वस्ति। नः। मघऽवा। धातु। इन्द्रः ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 32 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (मघवा) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाला (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) सुख को (धातु) धारण करे उसको (हवेहवे) सङ्ग्राम सङ्ग्राम में (त्रातारम्) पालन करनेवाले (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त (अवितारम्) ज्ञानादि के देने और (इन्द्रम्) अविद्या से दुष्ट जन के नाश करनेवाले (सुहवम्) सुन्दर पुकारना वा सङ्ग्राम जिसका उस (शूरम्) निर्भयत्व आदि गुणों से युक्त (इन्द्रम्) श्रेष्ठ गुणों के धारण करनेवाले (शक्रम्) समर्थ (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे गये (इन्द्रम्) सेना के धारण करनेवाले को (ह्वयामि) पुकारता हूँ, वैसे इसको आप लोग भी पुकारो ॥११॥
Essence
जो मनुष्य जैसे सर्वत्र सहायक परमेश्वर को पुकारते हैं, वे वैसे ही राजा का भी सर्वत्र आश्रयण करें ॥११॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे और प्रजायें उसका किसलिये आश्रयण करें, इस विषय को कहते हैं ॥