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Rigveda Mandal 6 / Sukta 46 / Mantra 5

75 Sukta
14 Mantra
6/46/5
Devata- इन्द्रः प्रगाथो वा Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ ज्येष्ठं॑ न॒ आ भ॑रँ॒ ओजि॑ष्ठं॒ पपु॑रि॒ श्रवः॑। येने॒मे चि॑त्र वज्रहस्त॒ रोद॑सी॒ ओभे सु॑शिप्र॒ प्राः ॥५॥

इन्द्र॑ । ज्येष्ठ॑म् । नः॒ । आ । भ॒र॒ । ओजि॑ष्ठम् । पपु॑रि । श्रवः॑ । येन॑ । इ॒मे इति॑ । चि॒त्र॒ । व॒ज्र॒ऽह॒स्त॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । आ । उ॒भे इति॑ । सु॒शि॒प्र॒ । प्राः ॥

Mantra without Swara
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भरँ ओजिष्ठं पपुरि श्रवः। येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओभे सुशिप्र प्राः ॥

इन्द्र। ज्येष्ठम्। नः। आ। भर। ओजिष्ठम्। पपुरि। श्रवः। येन। इमे इति। चित्र। वज्रऽहस्त। रोदसी इति। आ। उभे इति। सुशिप्र। प्राः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 27 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुशिप्र) सुन्दर ठुड्ढी और नासिका युक्त (चित्र) अद्भुत गुण, कर्म्म और स्वभाववाले (वज्रहस्त) शस्त्र और अस्त्र हाथ में जिसके ऐसे और (इन्द्र) श्रेष्ठ गुणों के धारण करनेवाले ! आप (ज्येष्ठम्) अतिशय प्रशंसित (ओजिष्ठम्) अतिशय बल के देने (पपुरि) पालन करने और पुष्टि करनेवाले (श्रवः) अन्न वा श्रवण को (नः) हम लोगों के लिये (आ, भर) धारण करो (येन) जिससे (उभे) दोनों (इमे) इन (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ) सब प्रकार से (प्राः) व्याप्त होओ ॥५॥
Essence
हे राजन् ! आप ऐसे गुण, कर्म्म और स्वभाव का स्वीकर करें, जिससे न्याय, भूमि, राज्य, सेना और विजय को धारण करने को समर्थ होवें ॥५॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥