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Rigveda Mandal 6 / Sukta 46 / Mantra 3

75 Sukta
14 Mantra
6/46/3
Devata- इन्द्रः प्रगाथो वा Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यः स॑त्रा॒हा विच॑र्षणि॒रिन्द्रं॒ तं हू॑महे व॒यम्। सह॑स्रमुष्क॒ तुवि॑नृम्ण॒ सत्प॑ते॒ भवा॑ स॒मत्सु॑ नो वृ॒धे ॥३॥

यः । स॒त्रा॒ऽहा । विऽच॑र्षणिः । इन्द्र॑म् । तम् । हू॒म॒हे॒ । व॒यम् । सह॑स्रऽमुष्क । तुवि॑ऽनृम्ण । सत्ऽप॑ते । भव॑ । स॒मत्ऽसु॑ । नः॒ । वृ॒धे ॥

Mantra without Swara
यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तं हूमहे वयम्। सहस्रमुष्क तुविनृम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे ॥

यः। सत्राऽहा। विऽचर्षणिः। इन्द्रम्। तम्। हूमहे। वयम्। सहस्रऽमुष्क। तुविऽनृम्ण। सत्ऽपते। भव। समत्ऽसु। नः। वृधे ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 27 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहस्रमुष्क) असङ्ख्य पराक्रमवाले (तुविनृम्ण) बहुत धनों से युक्त (सत्पते) विद्वानों के पालनेवाले अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त (यः) जो (विचर्षणिः) विद्वान् मनुष्य (सत्राहा) सत्य दिनों में (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त को पुकारता है, वैसे (तम्) उसकी (वयम्) हम लोग (हूमहे) प्रशंसा करते हैं और आप (समत्सु) सङ्ग्रामों में (नः) हम लोगों की (वृधे) वृद्धि के लिये (भवा) हूजिये ॥३॥
Essence
उसी की हम लोग प्रशंसा करते हैं, जो प्रतिदिन हम लोगों की रक्षा करता है और उसी की हम लोग सङ्ग्राम में रक्षा करें ॥३॥
Subject
फिर मनुष्य सङ्ग्राम में कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥