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Rigveda Mandal 6 / Sukta 46 / Mantra 13

75 Sukta
14 Mantra
6/46/13
Devata- इन्द्रः प्रगाथो वा Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यदि॑न्द्र॒ सर्गे॒ अर्व॑तश्चो॒दया॑से महाध॒ने। अ॒स॒म॒ने अध्व॑नि वृजि॒ने प॒थि श्ये॒नाँइ॑व श्रवस्य॒तः ॥१३॥

यत् । इ॒न्द्र॒ । सर्गे॑ । अर्व॑तः । चो॒दया॑से । म॒हा॒ऽध॒ने । अ॒स॒म॒ने । अध्व॑नि । वृ॒जि॒ने । प॒थि । श्ये॒नान्ऽइ॑व । श्र॒व॒स्य॒तः ॥

Mantra without Swara
यदिन्द्र सर्गे अर्वतश्चोदयासे महाधने। असमने अध्वनि वृजिने पथि श्येनाँइव श्रवस्यतः ॥

यत्। इन्द्र। सर्गे। अर्वतः। चोदयासे। महाऽधने। असमने। अध्वनि। वृजिने। पथि। श्येनान्ऽइव। श्रवस्यतः ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 29 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) वीर शत्रुओं के नाश करनेवाले (यत्) जहाँ (सर्गे) मिलने योग्य (महाधने) बड़े धन जिससे उस और (असमने) नहीं विद्यमान सङ्ग्राम जिसमें ऐसे (वृजिने) बलकारक (अध्वनि) मार्ग में और (पथि) आकाशमार्ग में (श्येनाविव) बाजों को जैसे वैसे (श्रवस्यतः) सुख की इच्छा करते हुए (अर्वतः) घोड़े आदि को (चोदयासे) प्रेरणा करिये, वहाँ आपका दूर भी स्थित स्थान निकट सा होवे ॥१३॥
Essence
हे राजन् ! युद्ध के विना भी जब जब कार्य्य के लिये गमन आप करें तब तब शीघ्र ही जाना चाहिये और शिथिलता पैरों से वा वाहन से जाने में नहीं करनी चाहिये ॥१३॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसे गमनादिक करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥