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Rigveda Mandal 6 / Sukta 46 / Mantra 12

75 Sukta
14 Mantra
6/46/12
Devata- इन्द्रः प्रगाथो वा Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- विराड्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यत्र॒ शूरा॑सस्त॒न्वो॑ वितन्व॒ते प्रि॒या शर्म॑ पितॄ॒णाम्। अध॑ स्मा यच्छ त॒न्वे॒३॒॑ तने॑ च छ॒र्दिर॒चित्तं॑ या॒वय॒ द्वेषः॑ ॥१२॥

यत्र॑ । शूरा॑सः । त॒न्वः॑ । वि॒ऽत॒न्व॒ते । प्रि॒या । शर्म॑ । पि॒तॄ॒णाम् । अध॑ । स्म॒ । य॒च्छ॒ । त॒न्वे॑ । तने॑ । च॒ । छ॒र्धिः । अ॒चित्त॑म् । य॒वय॑ । द्वेषः॑ ॥

Mantra without Swara
यत्र शूरासस्तन्वो वितन्वते प्रिया शर्म पितॄणाम्। अध स्मा यच्छ तन्वे३ तने च छर्दिरचित्तं यावय द्वेषः ॥

यत्र। शूरासः। तन्वः। विऽतन्वते। प्रिया। शर्म। पितॄणाम्। अध। स्म। यच्छ। तन्वे। तने। च। छर्धिः। अचित्तम्। यवय। द्वेषः ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 29 Mantra » 2

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Meaning
हे ऐश्वर्य्य के बढ़ानेवाले ! (यत्र) जहाँ (शूरासः) युद्ध में चतुर जन (पितॄणाम्) अपने पिता और स्वामियों के (तन्वः) शरीरों को (वितन्वते) बढ़ाते हैं और (प्रिया) प्रिय (शर्म) गृहों को बढ़ाते हैं (अध) इसके अनन्तर (तन्वे) शरीर के लिये (तने) बढ़े हुए व्यवहार में (च) भी (अचित्तम्) चेतनता से रहित (छर्दिः) गृह को आप (यच्छ) ग्रहण करिये वहाँ (द्वेषः) शत्रुओं को (स्म) ही (यावय) पृथक् कराइये ॥१२॥
Essence
हे राजन् ! शूरवीर धार्मिक जनों की सत्कारपूर्वक उत्तम प्रकार रक्षा कर शत्रुओं का निवारण कर उत्तम गृहों में पितरों और स्वामी जनों के लिये सुन्दर भोगों को देकर अपने यश का विस्तार करो ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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