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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 9

75 Sukta
33 Mantra
6/45/9
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि दृ॒ळ्हानि॑ चिदद्रिवो॒ जना॑नां शचीपते। वृ॒ह मा॒या अ॑नानत ॥९॥

वि । दृ॒ळ्हानि॑ । चि॒त् । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । जना॑नाम् । श॒ची॒ऽप॒ते॒ । वृ॒ह । मा॒याः । अ॒ना॒न॒त॒ ॥

Mantra without Swara
वि दृळ्हानि चिदद्रिवो जनानां शचीपते। वृह माया अनानत ॥

वि। दृळ्हानि। चित्। अद्रिऽवः। जनानाम्। शचीऽपते। वृह। मायाः। अनानत ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अद्रिवः) मेघों के करनेवाले सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान (अनानत) शत्रुओं के समीप में नम्रता से रहित (शचीपते) प्रजा के स्वामिन् ! आप (मायाः) कपटों को (वृह) काटो और (चित्) भी (जनानाम्) मनुष्यों की (दृळ्हानि) निश्चित सेनाओं को करके शत्रुओं का (वि) विशेष करके नाश करिये ॥९॥
Essence
वह राजा, आचार्य्य वा अध्यापक उत्तम होवे, जो छल आदि दोषों का निवारण करके मनुष्यों को धर्म्म के आचरण से युक्त निरन्तर करे ॥९॥
Subject
फिर मनुष्य किसका निवारण करके किसको प्राप्त होवें, इस विषय को कहते हैं ॥