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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 8

75 Sukta
33 Mantra
6/45/8
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यस्य॒ विश्वा॑नि॒ हस्त॑योरू॒चुर्वसू॑नि॒ नि द्वि॒ता। वी॒रस्य॑ पृतना॒षहः॑ ॥८॥

यस्य॑ । विश्वा॑नि । हस्त॑योः । ऊ॒चुः । वसू॑नि । नि । द्वि॒ता । वी॒रस्य॑ । पृ॒त॒ना॒ऽसहः॑ ॥

Mantra without Swara
यस्य विश्वानि हस्तयोरूचुर्वसूनि नि द्विता। वीरस्य पृतनाषहः ॥

यस्य। विश्वानि। हस्तयोः। ऊचुः। वसूनि। नि। द्विता। वीरस्य। पृतनाऽसहः ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! (यस्य) जिस राजादि विद्वान् (वीरस्य) शत्रु के बल को दबानेवाले के (हस्तयोः) हाथों में (विश्वानि) सम्पूर्ण (वसूनि) द्रव्यों को (पृतनाषहः) शत्रुओं की सेना को सहनेवाले (नि) निश्चित (उचुः) कहते हैं उसके साथ (द्विता) दोनों-राजा और प्रजा तथा उपदेश देनेवाले और उपदेश देने योग्यपने की रक्षा करो ॥८॥
Essence
जो राजा विद्या और विनय से पुत्र के सदृश प्रजाओं की पालना करे तो सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य और सम्पूर्ण सुख उसके आधीन ही होवे, जिससे उत्तम मन्त्री और प्रशंसित सेना को प्राप्त होकर राजा प्रजाजनों के कल्याण को कर सकता है ॥८॥
Subject
फिर क्या करके राजा ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवे, इस विषय को कहते हैं ॥