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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 5

75 Sukta
33 Mantra
6/45/5
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वमेक॑स्य वृत्रहन्नवि॒ता द्वयो॑रसि। उ॒तेदृशे॒ यथा॑ व॒यम् ॥५॥

त्वम् । एक॑स्य । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । अ॒वि॒ता । द्वयोः॑ । अ॒सि॒ । उ॒त । ई॒दृशे॑ । यथा॑ । व॒यम् ॥

Mantra without Swara
त्वमेकस्य वृत्रहन्नविता द्वयोरसि। उतेदृशे यथा वयम् ॥

त्वम्। एकस्य। वृत्रऽहन्। अविता। द्वयोः। असि। उत। ईदृशे। यथा। वयम् ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 5

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Meaning
हे (वृत्रहन्) मेघ को नाश करनेवाले सूर्य के समान शत्रुओं के मारनेवाले राजन् ! (यथा) जैसे (वयम्) हम लोग (ईदृशे) ऐसे व्यवहार में (एकस्य) सहायरहित के (उत) और (द्वयोः) राजा और प्रजाजनों के रक्षक होते हैं, वैसे जिससे (त्वम्) आप (अविता) रक्षक (असि) हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥५॥
Essence
हे राजन् ! जैसे हम लोग पक्षपात का त्याग करके अपने और अन्य जन का यथावत् न्याय करें, वैसे ही आप करिये। ऐसे धर्म्मयुक्त व्यवहार में वर्त्तमान हम लोगों की सदा ही वृद्धि और मोक्ष होते हैं ॥५॥
Subject
फिर राजा और मन्त्रियों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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