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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 4

75 Sukta
33 Mantra
6/45/4
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सखा॑यो॒ ब्रह्म॑वाह॒सेऽर्च॑त॒ प्र च॑ गायत। स हि नः॒ प्रम॑तिर्म॒ही ॥४॥

सखा॑यः । ब्रह्म॑ऽवाहसे । अर्च॑त । प्र । च॒ । गा॒य॒त॒ । सः । हि । नः॒ । प्रऽम॑तिः । म॒ही ॥

Mantra without Swara
सखायो ब्रह्मवाहसेऽर्चत प्र च गायत। स हि नः प्रमतिर्मही ॥

सखायः। ब्रह्मऽवाहसे। अर्चत। प्र। च। गायत। सः। हि। नः। प्रऽमतिः। मही ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (सखायः) मित्रो ! आप लोग (ब्रह्मवाहसे) वेद और ईश्वर के विज्ञान प्राप्त कराने के लिये जिसका (प्र, अर्चत) अत्यन्त सत्कार करो (गायत, च) और प्रशंसा करो जिससे (नः) हम लोगों के लिये (प्रमतिः) अच्छी बुद्धि (मही) और बड़ी वाणी दी जाती है (सः, हि) वही जगदीश्वर और विद्वान् हम लोगों से उपासना और सेवा करने योग्य है ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग परस्पर मित्र होकर परमेश्वर और सब के कल्याण के लिये प्रवृत्त यथार्थवक्ता तथा उपदेशक का सदा ही सत्कार करो, जिससे हम लोगों को उत्तम बुद्धि और वाणी प्राप्त होवे ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को किसका सत्कार करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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