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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 33

75 Sukta
33 Mantra
6/45/33
Devata- बृबुस्तक्षा Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तत्सु नो॒ विश्वे॑ अ॒र्य आ सदा॑ गृणन्ति का॒रवः॑। बृ॒बुं स॑हस्र॒दात॑मं सू॒रिं स॑हस्र॒सात॑मम् ॥३३॥

तत् । सु । नः॒ । विश्वे॑ । अ॒र्यः । आ । सदा॑ । गृ॒ण॒न्ति॒ । का॒रवः॑ । बृ॒बुम् । स॒ह॒स्र॒ऽदात॑मम् । सू॒रिम् । स॒ह॒स्र॒ऽसात॑मम् ॥

Mantra without Swara
तत्सु नो विश्वे अर्य आ सदा गृणन्ति कारवः। बृबुं सहस्रदातमं सूरिं सहस्रसातमम् ॥

तत्। सु। नः। विश्वे। अर्यः। आ। सदा। गृणन्ति। कारवः। बृबुम्। सहस्रऽदातमम्। सूरिम्। सहस्रऽसातमम् ॥३३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
जो (नः) हम लोगों के (विश्वे) सब (कारवः) कारीगर जन (सहस्रदातमम्) अतिशय असङ्ख्य देनेवाले (बृबुम्) मुख्य शिल्पी (सहस्रसातमम्) अतिशय असङ्ख्य पदार्थ बाँटनेवाले (सूरिम्) विद्वान् को (सु) उत्तमता से (आ) सब प्रकार (गृणन्ति) स्वीकार करते हैं, वे (तत्) उस अतुल ऐश्वर्य्य को (सदा) सर्वकाल में प्राप्त होते हैं और जो इन में (अर्यः) स्वामी वा वैश्य होवे, वह इन का उत्तम प्रकार सत्कार कर रक्षा करे ॥३३॥
Essence
जो जन क्रिया में निपुण विद्वानों और कारीगरों की प्रशंसा करते हैं, वे असङ्ख्य धन को प्राप्त होकर असङ्ख्य धन देने योग्य होते हैं ॥३३॥ इस सूक्त में राजनीति, धन के जीतनेवाले, मित्रपन, वेद के जाननेवाले, ऐश्वर्य्य से युक्त, दाता, कारीगर और स्वामी के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पैंतालीसवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥