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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 3

75 Sukta
33 Mantra
6/45/3
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म॒हीर॑स्य॒ प्रणी॑तयः पू॒र्वीरु॒त प्रश॑स्तयः। नास्य॑ क्षीयन्त ऊ॒तयः॑ ॥३॥

म॒हीः । अ॒स्य॒ । प्रऽनी॑तयः । पू॒र्वीः । उ॒त । प्रऽश॑स्तयः । न । अ॒स्य॒ । क्षी॒य॒न्ते॒ । ऊ॒तयः॑ ॥

Mantra without Swara
महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः। नास्य क्षीयन्त ऊतयः ॥

महीः। अस्य। प्रऽनीतयः। पूर्वीः। उत। प्रऽशस्तयः। न। अस्य। क्षीयन्ते। ऊतयः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (अस्य) इस राजा की (महीः) बड़ी (उत) और (पूर्वीः) प्राचीन वेदों में कही हुई (प्रणीतयः) उत्तम नीति और (ऊतयः) रक्षण आदि क्रियायें हैं (अस्य) इसकी (प्रशस्तयः) श्रेष्ठ कीर्तियाँ (न) नहीं (क्षीयन्ते) क्षीण होती हैं ॥३॥
Essence
जो राजाजन नित्य बड़ी राजधर्म्मनीति को धारण करके पुत्र के सदृश प्रजाओं का पालन करते हैं, उनका नाशरहित यश होता है ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥