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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 28

75 Sukta
33 Mantra
6/45/28
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒मा उ॑ त्वा सु॒तेसु॑ते॒ नक्ष॑न्ते गिर्वणो॒ गिरः॑। व॒त्सं गावो॒ न धे॒नवः॑ ॥२८॥

इ॒माः । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । सु॒तेऽसु॑ते । नक्ष॑न्ते । गि॒र्व॒णः॒ । गिरः॑ । व॒त्सम् । गावः॑ । न । धे॒नवः॑ ॥

Mantra without Swara
इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः। वत्सं गावो न धेनवः ॥

इमाः। ऊँ इति। त्वा। सुतेऽसुते। नक्षन्ते। गिर्वणः। गिरः। वत्सम्। गावः। न। धेनवः ॥२८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 3

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Meaning
हे (गिर्वणः) वाणियों से प्रशंसा करने योग्य ! (सुतेसुते) उत्पन्न-उत्पन्न हुए इस संसार में (इमाः) ये (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियाँ (वत्सम्) बछड़े को (धेनवः) दुग्ध की देनेवाली (गावः) गौवें (न) जैसे वैसे (त्वा) आपको (नक्षन्ते) व्याप्त हों, वे (उ) और हम लोगों को भी प्राप्त हों ॥२८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो श्रेष्ठ आचरण करनेवाले हैं, उनको गौ जैसे बछड़े को, वैसे सम्पूर्ण विद्या और वाणियाँ प्राप्त होती हैं ॥२८॥
Subject
अब किसके लिये कहाँ प्राप्त होवे, इस विषय को कहते हैं ॥