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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 27

75 Sukta
33 Mantra
6/45/27
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स म॑न्दस्वा॒ ह्यन्ध॑सो॒ राध॑से त॒न्वा॑ म॒हे। न स्तो॒तारं॑ नि॒दे क॑रः ॥२७॥

सः । म॒न्द॒स्व॒ । हि । अन्ध॑सः । राध॑से । त॒न्वा॑ । म॒हे । न । स्तो॒तार॑म् । नि॒दे । क॒रः॒ ॥

Mantra without Swara
स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे। न स्तोतारं निदे करः ॥

सः। मन्दस्व। हि। अन्धसः। राधसे। तन्वा। महे। न। स्तोतारम्। निदे। करः ॥२७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (हि) जिससे आप (तन्वा) शरीर से (महे) बड़े (राधसे) धन के लिये (अन्धसः) अन्न आदि से (मन्दस्वा) आनन्दित हूजिये वा आनन्दित करिये और (निदे) निन्दा करनेवाले के लिये (स्तोतारम्) स्तुति करनेवाले को (न) नहीं (करः) करिये इससे (सः) वह आप जनों को प्रिय हैं ॥२७॥
Essence
हे राजा और प्रजाजनो ! आप लोग अन्न आदि से सब को आनन्दित करिये और निन्दा न करने योग्यों की मत निन्दा करिये तथा ऐश्वर्य्य की वृद्धि के लिये निरन्तर प्रयत्न करिये ॥२७॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥