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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 24

75 Sukta
33 Mantra
6/45/24
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कु॒वित्स॑स्य॒ प्र हि व्र॒जं गोम॑न्तं दस्यु॒हा गम॑त्। शची॑भि॒रप॑ नो वरत् ॥२४॥

कु॒वित्ऽस॑स्य । प्र । हि । व्र॒जम् । गोऽम॑न्तम् । द॒स्यु॒ऽहा । गम॑त् । शची॑भिः । अप॑ । नः॒ । व॒र॒त् ॥

Mantra without Swara
कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत्। शचीभिरप नो वरत् ॥

कुवित्ऽसस्य। प्र। हि। व्रजम्। गोऽमन्तम्। दस्युऽहा। गमत्। शचीभिः। अप। नः। वरत् ॥२४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 4

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Meaning
जो (दस्युहा) दुष्ट चोरों को मारनेवाला राजा (शचीभिः) बुद्धिवाले कर्मों से (कुवित्सस्य) अत्यन्त विभाग करनेवाले के (गोमन्तम्) प्रशंसित गौवें विद्यमान और (व्रजम्) चलते हैं जिसमें उसकी (अप, गमत्) प्राप्त होता है वह (हि) ही (नः) हम लोगों को (प्र, वरत्) स्वीकार करे ॥२४॥
Essence
जो राजा दुष्टजनों को दूर करके न्याय व्यवहार के प्रचार के लिये उत्तम जनों का स्वीकार करता है, वह बड़े सत्य और असत्य का विचार करनेवाला होता है ॥२४॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

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