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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 23

75 Sukta
33 Mantra
6/45/23
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न घा॒ वसु॒र्नि य॑मते दा॒नं वाज॑स्य॒ गोम॑तः। यत्सी॒मुप॒ श्रव॒द्गिरः॑ ॥२३॥

न । घ॒ । वसुः॑ । नि । य॒म॒ते॒ । दा॒नम् । वाज॑स्य । गोऽम॑तः । यत् । सी॒म् । उप॑ । श्र॒व॒त् । गिरः॑ ॥

Mantra without Swara
न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः। यत्सीमुप श्रवद्गिरः ॥

न। घ। वसुः। नि। यमते। दानम्। वाजस्य। गोऽमतः। यत्। सीम्। उप। श्रवत्। गिरः ॥२३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 3

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Meaning
(यत्) जो जन (गोमतः) प्रशंसित वाणी से युक्त (वाजस्य) विज्ञान का (वसुः) वास दिलानेवाला (दानम्) दान को (नि) अत्यन्त (यमते) देता है (गिरः) वाणियों को (सीम्) सब प्रकार से (उप, श्रवत्) सुने वह (न, घा) नहीं मारा जाता है ॥२३॥
Essence
जो मनुष्य विद्या और अभयदान देता और सम्पूर्ण विद्वानों से सत्य सुनता है, वह इस संसार में विघ्नों से नहीं मारा जाता है ॥२३॥
Subject
फिर राजा प्रजाजन परस्पर कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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