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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 2

75 Sukta
33 Mantra
6/45/2
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒वि॒प्रे चि॒द्वयो॒ दध॑दना॒शुना॑ चि॒दर्व॑ता। इन्द्रो॒ जेता॑ हि॒तं धन॑म् ॥२॥

अ॒वि॒प्रे । चि॒त् । वयः॑ । दध॑त् । अ॒ना॒शुना॑ । चि॒त् । अर्व॑ता । इन्द्रः॑ । जेता॑ । हि॒तम् । धन॑म् ॥

Mantra without Swara
अविप्रे चिद्वयो दधदनाशुना चिदर्वता। इन्द्रो जेता हितं धनम् ॥

अविप्रे। चित्। वयः। दधत्। अनाशुना। चित्। अर्वता। इन्द्रः। जेता। हितम्। धनम् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) शत्रुओं का नाश करनेवाला (अविप्रे) बुद्धिरहित में (चित्) भी (वयः) सुन्दर जीवन वा विज्ञान को (दधत्) धारण करता है तथा (अनाशुना) घोड़े से रहित शीघ्र जानेवाले वाहन से (अर्वता) घोड़े से (चित्) भी (हितम्) सुखकारक (धनम्) द्रव्य को (जेता) जीतनेवाला धारण करता है, वह यशस्वी होता है, यह जानना चाहिये ॥२॥
Essence
जो विद्वान् राजा बालकों और अज्ञों में अध्यापन और उपदेश के प्रचार से विद्या को धारण करता है, वह यशस्वी होकर विना सेना के भी राज्य को प्राप्त होता है ॥२॥
Subject
फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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