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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 18

75 Sukta
33 Mantra
6/45/18
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
धि॒ष्व वज्रं॒ गभ॑स्त्यो रक्षो॒हत्या॑य वज्रिवः। सा॒स॒ही॒ष्ठा अ॒भि स्पृधः॑ ॥१८॥

धि॒ष्व । वज्र॑म् । गभ॑स्त्योः । र॒क्षः॒ऽहत्या॑य । व॒ज्रि॒ऽवः॒ । स॒स॒ही॒ष्ठाः । अ॒भि । स्पृधः॑ ॥

Mantra without Swara
धिष्व वज्रं गभस्त्यो रक्षोहत्याय वज्रिवः। सासहीष्ठा अभि स्पृधः ॥

धिष्व। वज्रम्। गभस्त्योः। रक्षःऽहत्याय। वज्रिऽवः। ससहीष्ठाः। अभि। स्पृधः ॥१८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 24 Mantra » 3

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Meaning
हे (वज्रिवः) प्रशंसित शस्त्र और अस्त्रों के चलाने में चतुर और अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त राजन् ! आप (रक्षोहत्याय) दुष्टों के मारने के लिये (गभस्त्योः) हाथों के मध्य में (वज्रम्) शस्त्र और अस्त्रों के समूह को (धिष्व) धारण करिये तथा (स्पृधः) स्पृहा करने योग्य सङ्ग्रामों के (अभि) सन्मुख (सासहीष्ठाः) अत्यन्त सहिये ॥१८॥
Essence
हे राजन् वा सेना के जनो ! आप लोग शस्त्र और अस्त्रों के चलाने में चतुर होकर डाकू आदि शत्रुओं का नाश करके सहनशील हूजिये ॥१८॥
Subject
फिर राजा आदि क्या ध्यान करके क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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