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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 13

75 Sukta
33 Mantra
6/45/13
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अभू॑रु वीर गिर्वणो म॒हाँ इ॑न्द्र॒ धने॑ हि॒ते। भरे॑ वितन्त॒साय्यः॑ ॥१॥

अभूः॑ । ऊँ॒ इति॑ । वी॒र॒ । गि॒र्व॒णः॒ । म॒हान् । इ॒न्द्र॒ । धने॑ । हि॒ते । भरे॑ । वि॒त॒न्त॒साय्यः॑ ॥

Mantra without Swara
अभूरु वीर गिर्वणो महाँ इन्द्र धने हिते। भरे वितन्तसाय्यः ॥

अभूः। ऊँ इति। वीर। गिर्वणः। महान्। इन्द्र। धने। हिते। भरे। वितन्तसाय्यः ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 23 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (गिर्वणः) वाणियों से याचना किये गये (वीर) शूरता आदि गुणों से युक्त (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले ! आप (महान्) महाशय (वितन्तसाय्यः) अत्यन्त विजय में होनेवाले हुए (हिते) सुखकारक (धने) धन में (उ) और (भरे) सङ्ग्राम में जीतनेवाले (अभूः) हूजिये ॥१३॥
Essence
जो राजा सब के हित के प्राप्त होने की इच्छा करता हुआ पुरुषों में ज्ञानी, किये हुए को जाननेवाला और योद्धाओं का प्रिय होवे, उसके सदा ही विजय से प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य्य बढ़े ॥१३॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥