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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 12

75 Sukta
33 Mantra
6/45/12
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
धी॒भिरर्व॑द्भि॒रर्व॑तो॒ वाजाँ॑ इन्द्र श्र॒वाय्या॑न्। त्वया॑ जेष्म हि॒तं धन॑म् ॥१२॥

धी॒भिः । अर्व॑त्ऽभिः । अर्व॑तः । वाजा॑न् । इ॒न्द्र॒ । श्र॒वाय्या॑न् । त्वया॑ । जे॒ष्म॒ । हि॒तम् । धन॑म् ॥

Mantra without Swara
धीभिरर्वद्भिरर्वतो वाजाँ इन्द्र श्रवाय्यान्। त्वया जेष्म हितं धनम् ॥

धीभिः। अर्वत्ऽभिः। अर्वतः। वाजान्। इन्द्र। श्रवाय्यान्। त्वया। जेष्म। हितम्। धनम् ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 23 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) शत्रुओं के नाश करनेवाले ! जैसे हम लोग (धीभिः) बुद्धियों वा कर्म्मों से (अर्वद्भिः) शब्द करते हुए घोड़ों से (वाजान्) वेगयुक्त (श्रवाय्यान्) सुनने को इष्ट (अर्वतः) घोड़ों के सदृश प्राप्त होकर (त्वया) आपके साथ (हितम्) सुखकारक (धनम्) धन को (जेष्म) जीतें, वैसे आप हम लोगों के साथ सुख से वर्त्ताव करो ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब राजा आदि जन एक सम्मति कर उत्तम सेना के अङ्गों को सम्पादन कर और अन्यायकारी दुष्टों को जीत कर न्याय से प्राप्त हुए धन से सब का हित करें, तभी अपने हित की सिद्धि से युक्त होवें ॥१२॥
Subject
फिर राजा आदिकों को क्या प्राप्त करके क्या प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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