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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 11

75 Sukta
33 Mantra
6/45/11
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमु॑ त्वा॒ यः पु॒रासि॑थ॒ यो वा॑ नू॒नं हि॒ते धने॑। हव्यः॒ स श्रु॑धी॒ हव॑म् ॥११॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । यः । पु॒रा । आसि॑थ । यः । वा॒ । नू॒नम् । हि॒ते । धने॑ । हव्यः॑ । सः । श्रु॒धि॒ । हव॑म् ॥

Mantra without Swara
तमु त्वा यः पुरासिथ यो वा नूनं हिते धने। हव्यः स श्रुधी हवम् ॥

तम्। ऊँ इति। त्वा। यः। पुरा। आसिथ। यः। वा। नूनम्। हिते। धने। हव्यः। सः। श्रुधि। हवम् ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 23 Mantra » 1

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Meaning
हे राजन् ! (यः) जो आप (हिते) सुखकारक (धने) धन में (पुरा) प्रथम से (आसिथ) थे और (यः) जो (वा) वा (नूनम्) निश्चित सुखकारक धन में (हव्यः) पुकारने के योग्य हो (तम्, उ) उन्हीं (त्वा) आपको हम लोग सुनावें (सः) वह आप हम लोगों की (हवम्) बात को (श्रुधी) सुनिये ॥११॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो राजा सब के हित की इच्छा करे और सब को धन और ऐश्वर्य्य से युक्त करता है, वह बलिष्ठ और निर्बलों की बातों की प्रीति से सुन कर यथार्थ न्याय करता है, उसी का सब लोग निरन्तर सत्कार करें ॥११॥
Subject
फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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