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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 10

75 Sukta
33 Mantra
6/45/10
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमु॑ त्वा सत्य सोमपा॒ इन्द्र॑ वाजानां पते। अहू॑महि श्रव॒स्यवः॑ ॥१०॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । स॒त्य॒ । सो॒म॒ऽपाः॒ । इन्द्र॑ । वा॒जा॒ना॒म् । प॒ते॒ । अहू॑महि । श्र॒व॒स्यवः॑ ॥

Mantra without Swara
तमु त्वा सत्य सोमपा इन्द्र वाजानां पते। अहूमहि श्रवस्यवः ॥

तम्। ऊँ इति। त्वा। सत्य। सोमऽपाः। इन्द्र। वाजानाम्। पते। अहूमहि। श्रवस्यवः ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सत्य) श्रेष्ठों में श्रेष्ठ (सोमपाः) ऐश्वर्यकी रक्षा करने तथा (वाजानाम्) विज्ञान और अन्न आदिकों के (पते) पालने और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले ! (श्रवस्यवः) अपने अन्न आदि की इच्छा करनेवाले हम लोग (त्वा) आपकी (अहूमहि) प्रशंसा करें, वैसे (तम्, उ) उन्हीं को सब लोग पुकारें ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् वा विद्वन् ! आप श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभाव से युक्त होकर प्रजा के पालन में तत्पर सुशील और इन्द्रियों के जीतनेवाले जब तक होंगे, तबतक हम लोग आपको मानेंगे ॥१०॥
Subject
फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥