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Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 1

75 Sukta
33 Mantra
6/45/1
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य आन॑यत्परा॒वतः॒ सुनी॑ती तु॒र्वशं॒ यदु॑म्। इन्द्रः॒ स नो॒ युवा॒ सखा॑ ॥१॥

यः । आ । अन॑यत् । प॒रा॒ऽवतः॑ । सुऽनी॑ती । तु॒र्वश॑म् । यदु॑म् । इन्द्रः॑ । सः । नः॒ । युवा॑ । सखा॑ ॥

Mantra without Swara
य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम्। इन्द्रः स नो युवा सखा ॥

यः। आ। अनयत्। पराऽवतः। सुऽनीती। तुर्वशम्। यदुम्। इन्द्रः। सः। नः। युवा। सखा ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (युवा) शरीर और आत्मा के बल से युक्त (इन्द्रः) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों का देनेवाला राजा (सुनीती) सुन्दर न्याय से (परावतः) दूर देश से भी (तुर्वशम्) हिंसकों को वश में करनेवाले (यदुम्) यत्न करते हुए मनुष्य को (आ) सब प्रकार से (अनयत्) प्राप्त करावे (सः) वह (नः) हम लोगों का (सखा) मित्र हो ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम उस राजा के साथ मैत्री करो, जो सत्य न्याय से दूर देश में स्थित भी विद्या, विनय और परोपकार में कुशल, श्रेष्ठ मनुष्य को सुनकर अपने समीप लाता है, उस राजा के साथ मित्र हुए वर्त्ताव करो ॥१॥
Subject
अब तेंतीस ऋचावाले पैंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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