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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 3

75 Sukta
24 Mantra
6/44/3
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
येन॑ वृ॒द्धो न शव॑सा तु॒रो न स्वाभि॑रू॒तिभिः॑। सोमः॑ सु॒तः स इ॑न्द्र॒ तेऽस्ति॑ स्वधापते॒ मदः॑ ॥३॥

येन॑ । वृ॒द्धः । न । शव॑सा । तु॒रः । न । स्वाभिः॑ । ऊ॒तिऽभिः॑ । सोमः॑ । सु॒तः । सः । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । अस्ति॑ । स्व॒धा॒ऽप॒ते॒ मदः॑ ॥

Mantra without Swara
येन वृद्धो न शवसा तुरो न स्वाभिरूतिभिः। सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः ॥

येन। वृद्धः। न। शवसा। तुरः। न। स्वाभिः। ऊतिऽभिः। सोमः। सुतः। सः। इन्द्र। ते। अस्ति। स्वधाऽपते मदः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वधापते) अपने पदार्थों के धारण करनेवाले (इन्द्र) राजन् ! आप (येन) जिस ऐश्वर्य से और (शवसा) बल से (वृद्धः) (न) जैसे वैसे वा (तुरः) हिंसक (न) जैसे वैसे (स्वाभिः) अपनी (ऊतिभिः) रक्षाओं से (मदः) आनन्द देनेवाला (सः) वह (सोमः) ओषधियों का रस (सुतः) उत्पन्न किया गया (ते) आपका (अस्ति) है, उसकी आप वृद्धि कीजिये ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस पुरुषार्थ से विद्वान् होकर युवा भी वृद्ध होते हैं, उसको निरन्तर सञ्चित कीजिये अर्थात् स­ह कीजिये ॥३॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥