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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 24

75 Sukta
24 Mantra
6/44/24
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं द्यावा॑पृथि॒वी वि ष्क॑भायद॒यं रथ॑मयुनक्स॒प्तर॑श्मिम्। अ॒यं गोषु॒ शच्या॑ प॒क्वम॒न्तः सोमो॑ दाधार॒ दश॑यन्त्र॒मुत्स॑म् ॥२४॥

अ॒यम् । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । वि । स्क॒भा॒य॒त् । अ॒यम् । रथ॑म् । अ॒यु॒न॒क् । स॒प्तऽर॑श्मिम् । अ॒यम् । गोषु॑ । शच्या॑ । प॒क्वम् । अ॒न्तरिति॑ । सोमः॑ । दा॒धा॒र॒ । दश॑ऽयन्त्रम् । उत्स॑म् ॥

Mantra without Swara
अयं द्यावापृथिवी वि ष्कभायदयं रथमयुनक्सप्तरश्मिम्। अयं गोषु शच्या पक्वमन्तः सोमो दाधार दशयन्त्रमुत्सम् ॥

अयम्। द्यावापृथिवी इति। वि। स्कभायत्। अयम्। रथम्। अयुनक्। सप्तऽरश्मिम्। अयम्। गोषु। शच्या। पक्वम्। अन्तरिति। सोमः। दाधार। दशऽयन्त्रम्। उत्सम् ॥२४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 20 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! जैसे (अयम्) यह ईश्वर (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि को (वि) विशेष करके (स्कभायत्) धारण करता है और (अयम्) यह सब को धारण करनेवाला ईश्वर (सप्तरश्मिम्) सात प्रकार की विद्यारूप किरणें जिसमें उस (रथम्) सुन्दर सूर्य्यलोक को (अयुनक्) युक्त करता है और (अयम्) यह धारण और नहीं धारण करनेवाला परमात्मा (सोमः) सब जगत् को उत्पन्न करनेवाला (शच्या) सत्य कर्म्म से (गोषु) पृथिवियों वा धेनु आदि के (अन्तः) मध्य में (उत्सम्) कूप के सदृश जल से स्वेदित को जैसे वैसे (दशयन्त्रम्) सूक्ष्म और स्थूल दश प्रकार के भूत प्राणी यन्त्रित जिसमें उस (पक्वम्) पके हुए को (दाधार) धारण करता है, वैसे आप लोग भी धारण कीजिये ॥२४॥
Essence
हे विद्वान् जनो ! जो सूर्य्य के सदृश न्याय को, पृथिवी के सदृश क्षमा को, सब के धारण और दुग्ध आदि रसों को और सब जगत् को यथावत् निर्माण करके धारण करता है, वैसे आप लोग भी इस सब को धारण करिये ॥२४॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और ईश्वर के गुण कर्मों के वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चवालीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
विद्वान् जन ईश्वर के सदृश वर्त्तमान करे, इस विषय को कहते हैं ॥