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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 20

75 Sukta
24 Mantra
6/44/20
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ ते॑ वृष॒न्वृष॑णो॒ द्रोण॑मस्थुर्घृत॒प्रुषो॒ नोर्मयो॒ मद॑न्तः। इन्द्र॒ प्र तुभ्यं॒ वृष॑भिः सु॒तानां॒ वृष्णे॑ भरन्ति वृष॒भाय॒ सोम॑म् ॥२०॥

आ । ते॒ । वृ॒ष॒न् । वृष॑णः । द्रोण॑म् । अ॒स्थुः॒ । घृ॒त॒ऽप्रुषः॑ । न । ऊ॒र्मयः॑ । मद॑न्तः । इन्द्र॑ । प्र । तुभ्य॑म् । वृष॑ऽभिः । सु॒ताना॑म् । वृष्णे॑ । भ॒र॒न्ति॒ । वृ॒ष॒भाय॑ । सोम॑म् ॥

Mantra without Swara
आ ते वृषन्वृषणो द्रोणमस्थुर्घृतप्रुषो नोर्मयो मदन्तः। इन्द्र प्र तुभ्यं वृषभिः सुतानां वृष्णे भरन्ति वृषभाय सोमम् ॥

आ। ते। वृषन्। वृषणः। द्रोणम्। अस्थुः। घृतऽप्रुषः। न। ऊर्मयः। मदन्तः। इन्द्र। प्र। तुभ्यम्। वृषऽभिः। सुतानाम्। वृष्णे। भरन्ति। वृषभाय। सोमम् ॥२०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषन्) बल से युक्त (इन्द्र) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों से सम्पन्न ! जो (ते) आपके (वृषणः) बलिष्ठ (घृतप्रुषः) जल को पूर्ण करनेवाले (ऊर्मयः) समुद्र आदि के जल के तरंग (न) जैसे वैसे आपको (मदन्तः) आनन्द देते हुए (वृषभिः) बलिष्ठ वैद्यों से (सुतानाम्) उत्पन्न किये हुए (सोमम्) बड़ी ओषधियों के रस को (वृष्णे) बल के और (वृषभाय) बल की इच्छा करनेवाले (तुभ्यम्) आपके लिये (प्र, भरन्ति) अच्छे प्रकार धारण करते हैं तथा (द्रोणम्) जाते हैं जिस विमान आदि वाहन से उस पर (आ) सब प्रकार से (अस्थुः) स्थित होते हैं, उनको आप प्रसन्न करिये ॥२०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन् ! जो सत्यभाव से आपके राज्य के हित करने की इच्छा करते हैं, उनको आप सुखी रखिये और जैसे वायु से जल के तरङ्ग हैं, वैसे ही सत्संग से बुद्धियाँ बढ़ती हैं, ऐसा जानो ॥२०॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥