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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 19

75 Sukta
24 Mantra
6/44/19
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ त्वा॒ हर॑यो॒ वृष॑णो युजा॒ना वृष॑रथासो॒ वृष॑रश्म॒योऽत्याः॑। अ॒स्म॒त्राञ्चो॒ वृष॑णो वज्र॒वाहो॒ वृष्णे॒ मदा॑य सु॒युजो॑ वहन्तु ॥१९॥

आ । त्वा॒ । हर॑यः । वृष॑णः । यु॒जा॒नाः । वृष॑ऽरथासः । वृष॑ऽरश्मयः । अत्याः॑ । अ॒स्म॒त्राञ्चः॑ । वृष॑णः । व॒ज्र॒ऽवाहः॑ । वृष्णे॑ । मदा॑य । सु॒ऽयुजः॑ । व॒ह॒न्तु॒ ॥

Mantra without Swara
आ त्वा हरयो वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्याः। अस्मत्राञ्चो वृषणो वज्रवाहो वृष्णे मदाय सुयुजो वहन्तु ॥

आ। त्वा। हरयः। वृषणः। युजानाः। वृषऽरथासः। वृषऽरश्मयः। अत्याः। अस्मत्राञ्चः। वृषणः। वज्रऽवाहः। वृष्णे। मदाय। सुऽयुजः। वहन्तु ॥१९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 4

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Meaning
हे अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त राजन् ! जैसे (वृषणः) बलयुक्त (युजानाः) जिनके सावधान आत्मा और (वृषरथासः) बलयुक्त सेना के अङ्ग जिनके वे (वृषरश्मयः) किरणों के सदृश विजय सुख के वर्षानेवाले तेजस्वी (अत्याः) सम्पूर्ण श्रेष्ठगुण और कर्म्मों में व्यापी (अस्मत्राञ्च) शत्रुओं से हम लोगों की रक्षा करनेवालों को प्राप्त होने और (वृषणः) शत्रुशक्ति के रोकनेवाले (वज्रवाहः) शस्त्र और अस्त्रों की विद्या को धारण करने तथा (सुयुजः) उत्तम प्रकार युक्त होने वा युक्त करानेवाले (हरयः) उत्तम प्रकार शिक्षित घोड़ों के सदृश मनुष्य (वृष्णे) बलकारक (मदाय) आनन्द के लिये (त्वा) आपको (वहन्तु) प्राप्त हों वा प्राप्त करावें, वैसे इनको आप प्रीति से (आ) प्राप्त हूजिये ॥१९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि उत्तम प्रकार परीक्षा करके उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववाले मनुष्यों को राज्य कर्म्म के अधिकारों में नियुक्त करे तथा आप भी श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभाववाला होवे ॥१९॥
Subject
फिर राजा और मन्त्रीजन कैसे होवें, इस विषय को कहते हैं ॥

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