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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 16

75 Sukta
24 Mantra
6/44/16
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒दं त्यत्पात्र॑मिन्द्र॒पान॒मिन्द्र॑स्य प्रि॒यम॒मृत॑मपायि। मत्स॒द्यथा॑ सौमन॒साय॑ दे॒वं व्य१॒॑स्मद्द्वेषो॑ यु॒यव॒द्व्यंहः॑ ॥१६॥

इ॒दम् । त्यत् । पात्र॑म् । इ॒न्द्र॒ऽपान॑म् । इन्द्र॑स्य । प्रि॒यम् । अ॒मृत॑म् । अ॒पा॒यि॒ । मत्स॑त् । यथा॑ । सौ॒म॒न॒साय॑ । दे॒वम् । वि । अ॒स्मत् । द्वेषः॑ । यु॒यव॑त् । वि । अंहः॑ ॥

Mantra without Swara
इदं त्यत्पात्रमिन्द्रपानमिन्द्रस्य प्रियममृतमपायि। मत्सद्यथा सौमनसाय देवं व्य१स्मद्द्वेषो युयवद्व्यंहः ॥

इदम्। त्यत्। पात्रम्। इन्द्रऽपानम्। इन्द्रस्य। प्रियम्। अमृतम्। अपायि। मत्सत्। यथा। सौमनसाय। देवम्। वि। अस्मत्। द्वेषः। युयवत्। वि। अंहः ॥१६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! आप (सौमनसाय) अच्छे मन के होने के लिये (यथा) जैसे (इदम्) इस (त्यत्) उस (इन्द्रपानम्) ओषधियों के रस वा ऐश्वर्य्य के पान वा रक्षण को (इन्द्रस्य) इन्द्रियों के स्वामी जीव के (प्रियम्) प्रीतिकारक (अमृतम्) अच्छे प्रकार स्वादिष्ठ (पात्रम्) जिससे पान करता वा रक्षा करता है उसको (अपायि) पीता है और जिससे (मत्सत्) आनन्दित होता है तथा (देवम्) श्रेष्ठगुणकर्मयुक्त वस्तु का पान करता है और (अस्मत्) हम लोगों से (द्वेषः) द्वेष आदि से युक्त कर्म्म वा शत्रु को (वि, युयवत्) वियुक्त करता है और हम लोगों से (अंहः) पापाचरण को (वि) पृथक् करता है, वैसा आचरण करो ॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जिससे मन में प्रमाद और द्वेष न होवे, उसी का पान करना चाहिये और जैसे अपने आत्मा की सब रक्षा करते हैं, वैसे अन्य सबों की रक्षा करें ॥१६॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥