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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 15

75 Sukta
24 Mantra
6/44/15
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पाता॑ सु॒तमिन्द्रो॑ अस्तु॒ सोमं॒ हन्ता॑ वृ॒त्रं वज्रे॑ण मन्दसा॒नः। गन्ता॑ य॒ज्ञं प॑रा॒वत॑श्चि॒दच्छा॒ वसु॑र्धी॒नाम॑वि॒ता का॒रुधा॑याः ॥१५॥

पाता॑ । सु॒तम् । इन्द्रः॑ । अ॒स्तु॒ । सोम॑म् । हन्ता॑ । वृ॒त्रम् । वज्रे॑ण । म॒न्द॒सा॒नः । गन्ता॑ । य॒ज्ञम् । प॒रा॒ऽवतः॑ । चि॒त् । अच्छ॑ । वसुः॑ । धी॒नाम् । अ॒वि॒ता । का॒रुऽधा॑याः ॥

Mantra without Swara
पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं हन्ता वृत्रं वज्रेण मन्दसानः। गन्ता यज्ञं परावतश्चिदच्छा वसुर्धीनामविता कारुधायाः ॥

पाता। सुतम्। इन्द्रः। अस्तु। सोमम्। हन्ता। वृत्रम्। वज्रेण। मन्दसानः। गन्ता। यज्ञम्। पराऽवतः। चित्। अच्छ। वसुः। धीनाम्। अविता। कारुऽधायाः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्य का देनेवाला (सुतम्) उत्पन्न हुए (सोमम्) ओषधिरस को (पाता) पान करनेवाला (वज्रेण) शस्त्र और अस्त्रों के समूह से (मन्दसानः) कामना करता हुआ (वृत्रम्) मेघ को सूर्य्य जैसे वैसे शत्रुओं को (हन्ता) मारने (यज्ञम्) श्रेष्ठक्रियास्वरूप व्यवहार को (गन्ता) प्राप्त होने (परावतः) दूर देश से (चित्) भी (कारुधायाः) शिल्पी जनों का धारण करनेवाला और (वसुः) बसानेवाला होता हुआ (धीनाम्) उत्तम कर्म्मों की (अच्छा) अच्छे प्रकार (अविता) रक्षा करनेवाला है, वह अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त (अस्तु) हो, उसका आप लोग निरन्तर सत्कार करो ॥१५॥
Essence
जो राजा आदि मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से उत्पन्न किये ओषधियों के रस को पीते हैं तथा शस्त्र और अस्त्र की विद्या से दुष्टों का निवारण करके न्यायप्रचार नामक कर्म्म का प्रचार करके सत्कर्म्म के करने और शिल्पविद्या के जाननेवालों को स­ह करके आलस्य का त्याग करके श्रेष्ठ कर्म्मों में प्रवृत्त होते, वे ही यहाँ प्रशंसनीय होते हैं ॥१५॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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