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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 13

75 Sukta
24 Mantra
6/44/13
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध्व॑र्यो वीर॒ प्र म॒हे सु॒ताना॒मिन्द्रा॑य भर॒ स ह्य॑स्य॒ राजा॑। यः पू॒र्व्याभि॑रु॒त नूत॑नाभिर्गी॒र्भिर्वा॑वृ॒धे गृ॑ण॒तामृषी॑णाम् ॥१३॥

अध्व॑र्यो॒ इति॑ । वी॒र॒ । प्र । म॒हे । सु॒ताना॑म् । इन्द्रा॑य । भ॒र॒ । सः । हि । अ॒स्य॒ । राजा॑ । यः । पू॒र्व्याभिः॑ । उ॒त । नूत॑नाभिः । गीः॒ऽभिः । व॒वृ॒धे । गृ॒ण॒ताम् । ऋषी॑णाम् ॥

Mantra without Swara
अध्वर्यो वीर प्र महे सुतानामिन्द्राय भर स ह्यस्य राजा। यः पूर्व्याभिरुत नूतनाभिर्गीर्भिर्वावृधे गृणतामृषीणाम् ॥

अध्वर्यो इति। वीर। प्र। महे। सुतानाम्। इन्द्राय। भर। सः। हि। अस्य। राजा। यः। पूर्व्याभिः। उत। नूतनाभिः। गीःऽभिः। ववृधे। गृणताम्। ऋषीणाम् ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अध्वर्यो) नहीं हिंसा करनेवाले (वीर) दुष्टों की हिंसा करनेवाले ! (यः) जो (राजा) राजा (गृणताम्) प्रशंसा करनेवाले (ऋषीणाम्) मन्त्रों के अर्थ जाननेवालों की (पूर्व्याभिः) पूर्व जनों से सेवित (उत) भी (नूतनाभिः) नवीन वर्त्तमान (गीर्भिः) वाणियों से (वावृधे) वृद्धि को प्राप्त होता है (सः, हि) वही (अस्य) इस राज्य का राजा होने को योग्य हो, वैसे आप (सुतानाम्) उत्पन्न हुए पदार्थों के (महे) बड़े (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के लिये इन को (प्र, भर) धारण करिये ॥१३॥
Essence
वही राज्य पालन करने और बढ़ाने को समर्थ होता है, जो यथार्थवक्ताओं के सहित, उत्तम प्रकार शिक्षित और न्यायेश होवे और वही विद्वान् होता है, जो शिष्ट जनों से नित्य उपदेश सुनता है ॥१३॥
Subject
कौन इस पृथिवी पर राजा होने के योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥