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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 12

75 Sukta
24 Mantra
6/44/12
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उद॒भ्राणी॑व स्त॒नय॑न्निय॒र्तीन्द्रो॒ राधां॒स्यश्व्या॑नि॒ गव्या॑। त्वम॑सि प्र॒दिवः॑ का॒रुधा॑या॒ मा त्वा॑दा॒मान॒ आ द॑भन्म॒घोनः॑ ॥१२॥

उत् । अ॒भ्राणि॑ऽइव । स्त॒नय॑न् । इ॒य॒र्ति॒ । इन्द्रः॑ । राधां॑सि । अश्व्या॑नि । गव्या॑ । त्वम् । आ॒सि॒ । प्र॒ऽदिवः॑ । का॒रुऽधा॑याः । मा । त्वा॒ । अ॒दा॒मानः॑ । आ । द॒भ॒न् । म॒घोनः॑ ॥

Mantra without Swara
उदभ्राणीव स्तनयन्नियर्तीन्द्रो राधांस्यश्व्यानि गव्या। त्वमसि प्रदिवः कारुधाया मा त्वादामान आ दभन्मघोनः ॥

उत्। अभ्राणिऽइव। स्तनयन्। इयर्ति। इन्द्रः। राधांसि। अश्व्यानि। गव्या। त्वम्। असि। प्रऽदिवः। कारुऽधायाः। मा। त्वा। अदामानः। आ। दभन्। मघोनः ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जिससे (स्तनयन्) शब्द करता हुआ (कारुधायाः) विद्वान् शिल्पी जनों का धारण करनेवाला (इन्द्रः) बिजुली के सदृश वा (अभ्राणीव) वायु के दलों के सदृश (अश्व्यानि) घोड़ों में हितकारक (गव्या) गौओं में हितकारक (राधांसि) सम्पूर्ण सुखों के करनेवाले धनों को (उत्) भी (इयर्त्ति) प्राप्त होता है और (प्रदिवः) अत्यन्त सुन्दर (मघोनः) धन से युक्त जनों को वह ग्रहण करनेवाला है और जैसे (अदामानः) आदाता जन (त्वा) आपकी (मा) मत (आ, दभन्) हिंसा करें और धन से युक्त जनों की मत हिंसा करें, वैसे (त्वम्) आप जो कर चुके (असि) हैं तो आप में कौन नम्र होता है ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिसकी मेघों की घटाओं के समान बलवती सेना, बिजुली के समान पराक्रमयुक्त वर्त्तमान है और जिससे सब गुणी संग्र­ह किये जाते हैं वही धन, धान्य, राज्य और पशु आदि पदार्थों को प्राप्त होता है ॥१२॥
Subject
फिर वह राजा किसके सदृश क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥