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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 11

75 Sukta
24 Mantra
6/44/11
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा जस्व॑ने वृषभ नो ररीथा॒ मा ते॑ रे॒वतः॑ स॒ख्ये रि॑षाम। पू॒र्वीष्ट॑ इन्द्र नि॒ष्षिधो॒ जने॑षु ज॒ह्यसु॑ष्वी॒न्प्र वृ॒हापृ॑णतः ॥११॥

मा । जस्व॑ने । वृ॒ष॒भ॒ । नः॒ । र॒री॒थाः॒ । मा । ते॒ । रे॒वतः॑ । स॒ख्ये । रि॒षा॒म॒ । पू॒र्वीः । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । निः॒ऽसिधः॑ । जने॑षु । ज॒हि । असु॑स्वीन् । प्र । वृ॒ह॒ । अपृ॑णतः ॥

Mantra without Swara
मा जस्वने वृषभ नो ररीथा मा ते रेवतः सख्ये रिषाम। पूर्वीष्ट इन्द्र निष्षिधो जनेषु जह्यसुष्वीन्प्र वृहापृणतः ॥

मा। जस्वने। वृषभ। नः। ररीथाः। मा। ते। रेवतः। सख्ये। रिषाम। पूर्वीः। ते। इन्द्र। निःऽसिधः। जनेषु। जहि। असुस्वीन्। प्र। वृह। अपृणतः ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषभ) बलयुक्त (इन्द्र) दुःखों के नाश करनेवाले राजन् ! आप (जस्वने) अन्याय से दूसरे के धन को अन्यत्र प्राप्त करानेवाले दुष्ट राजा के लिये (नः) हम लोगों को (मा) मत (ररीथाः) दीजिये और हम लोग (ते) आप (रेवतः) बहुत धनवाले के (सख्ये) मित्रपने के लिये (मा) नहीं (रिषाम) क्रुद्ध होवें और जो (ते) आपके (जनेषु) मनुष्यों में (पूर्वीः) प्राचीन (निःषिधः) सुखकारक क्रियायें हैं, उनको दीजिये (असुष्वीन्) उत्पत्ति के नहीं करनेवालों का (जहि) त्याग करिये और (अपृणतः) दुःख के देनेवाले दुर्जन से हम लोगों के (प्र, वृह) पृथक् करिये ॥११॥
Essence
हे राजन् ! जो हम लोगों को पीड़ा देवें उनके आधीन मत करिये और कल्याण में क्रियाओं को प्राप्त कराइये, वैसे हम लोग भी इस सब को आपके लिये करें। इस प्रकार मित्र होकर अभीष्ट मनोरथों को सब हम लोग प्राप्त होवें ॥११॥
Subject
मनुष्यों को क्या नहीं करके क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥