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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 10

75 Sukta
24 Mantra
6/44/10
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ तुभ्य॒मिन्म॑घवन्नभूम व॒यं दा॒त्रे ह॑रिवो॒ मा वि वे॑नः। नकि॑रा॒पिर्द॑दृशे मर्त्य॒त्रा किम॒ङ्ग र॑ध्र॒चोद॑नं त्वाहुः ॥१०॥

इन्द्र॑ । तुभ्य॑म् । इत् । म॒घ॒ऽव॒न् । अ॒भू॒म॒ । व॒यम् । दा॒त्रे । ह॒रि॒ऽवः॒ । मा । वि । वे॒नः॒ । नकिः॑ । आ॒पिः । द॒दृ॒शे॒ । म॒र्त्य॒ऽत्रा । किम् । अ॒ङ्ग । र॒ध्र॒ऽचोद॑नम् । त्वा॒ । आ॒हुः ॥

Mantra without Swara
इन्द्र तुभ्यमिन्मघवन्नभूम वयं दात्रे हरिवो मा वि वेनः। नकिरापिर्ददृशे मर्त्यत्रा किमङ्ग रध्रचोदनं त्वाहुः ॥

इन्द्र। तुभ्यम्। इत्। मघऽवन्। अभूम। वयम्। दात्रे। हरिऽवः। मा। वि। वेनः। नकिः। आपिः। ददृशे। मर्त्यऽत्रा। किम्। अङ्ग। रध्रऽचोदनम्। त्वा। आहुः ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 17 Mantra » 5

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Meaning
हे (अङ्ग) अङ्ग के तुल्य वर्त्तमान (हरिवः) प्रशंसित मनुष्यों से और (मघवन्) बहुत धनों से युक्त (इन्द्र) पूर्णविद्यावाले राजन् ! (दात्रे) दान करने के स्वभाववाले (तुभ्यम्) आपके लिये (इत्) ही देनेवाले (वयम्) हम लोग (अभूम) होवें आप हम लोगों की (मा) मत (वि, वेनः) कामना करिये और (आपिः) व्याप्त होनेवाला हुआ मैं आपको विरुद्ध दृष्टि से (नकिः) नहीं (ददृशे) देखता हूँ तथा (मर्त्यत्रा) मनुष्यों में आप (किम्) किस की इच्छा करते हो जिससे (रध्रचोदनम्) धन की प्राप्ति के लिये प्रेरणा करनेवाले आपको विद्वान् जन (आहुः) कहते हैं, इससे हम लोग आपका आश्रयण करें ॥१०॥
Essence
हे राजा और प्रजा जनो ! जैसे आप लोग आपस के लिये धन आदि से और सुख दान से सबको श्रेष्ठ कर्म्मों में प्रेरणा करिये, वैसे मिल के सत्य, न्यायपालन का अनुष्ठान करिये ॥१०॥
Subject
अब राजा और प्रजाजन परस्पर कहाँ प्रेरणा करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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