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Rigveda Mandal 6 / Sukta 43 / Mantra 4

75 Sukta
4 Mantra
6/43/4
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यस्य॑ मन्दा॒नो अन्ध॑सो॒ माघो॑नं दधि॒षे शवः॑। अ॒यं स सोम॑ इन्द्र ते सु॒तः पिब॑ ॥४॥

यस्य॑ । म॒न्दा॒नः । अन्ध॑सः । माघो॑नम् । द॒धि॒षे । शवः॑ । अ॒यम् । सः । सोमः॑ । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । सु॒तः । पिब॑ ॥

Mantra without Swara
यस्य मन्दानो अन्धसो माघोनं दधिषे शवः। अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब ॥

यस्य। मन्दानः। अन्धसः। माघोनम्। दधिषे। शवः। अयम्। सः। सोमः। इन्द्र। ते। सुतः। पिब ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) वैद्यराज ! (यस्य) जिस (अन्धसः) अन्न आदि की (मन्दानः) स्तुति करते हुए आप (माघोनम्) बहुधनयुक्त को और (शवः) बल का हेतु उसको (दधिषे) धारण करते हो (सः) वह (अयम्) यह (सोमः) ऐश्वर्य करनेवाला रस (ते) आपके लिये (सुतः) उत्पन्न किया गया उसको आप (पिब) पीजिये ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिससे बल, बुद्धि और सुख बढ़े, उसी रस और अन्न का निरन्तर सेवन करो ॥४॥ इस सूक्त में इन्द्र, सोम और विद्वान् के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जानी चाहिये ॥ यह ऋग्वेद के छठे मण्डल में तृतीय अनुवाक, तेंतीसवाँ सूक्त और चौथे अष्टक में सातवें अध्याय में पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वे क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥