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Rigveda Mandal 6 / Sukta 43 / Mantra 3

75 Sukta
4 Mantra
6/43/3
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यस्य॒ गा अ॒न्तरश्म॑नो॒ मदे॑ दृ॒ळ्हा अ॒वासृ॑जः। अ॒यं स सोम॑ इन्द्र ते सु॒तः पिब॑ ॥३॥

यस्य॑ । गाः । अ॒न्तः । अश्म॑नः । मदे॑ । दृ॒ळ्हाः । अ॒व॒ऽअसृ॑जः । अ॒यम् । सः । सोमः॑ । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । सु॒तः । पिब॑ ॥

Mantra without Swara
यस्य गा अन्तरश्मनो मदे दृळ्हा अवासृजः। अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब ॥

यस्य। गाः। अन्तः। अश्मनः। मदे। दृळ्हाः। अवऽअसृजः। अयम्। सः। सोमः। इन्द्र। ते। सुतः। पिब ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) सम्पूर्ण रोगों के नाश करनेवाले (यस्य) जिस (अश्मनः) मेघ के (अन्तः) मध्य में (दृळ्हाः) दृढ़ (गाः) किरणों को (मदे) आनन्द के लिये (अवासृजः) उत्पन्न करता है उसके सम्बन्ध से (सः) वह (अयम्) यह (सोमः) रोगों को नाश करनेवाला ओषधियों का रस (ते) आपके लिये (सुतः) निर्म्माण किया गया उसको आप (पिब) पीजिये ॥३॥
Essence
हे विद्वानो ! जिनके परमाणु मेघमण्डल में भी वर्त्तमान हैं, ओषधियों से उसका निर्म्माण वैद्यक रीति से कर और उसका सेवन करके रोगरहित हूजिये ॥३॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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