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Rigveda Mandal 6 / Sukta 42 / Mantra 1

75 Sukta
4 Mantra
6/42/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्रत्य॑स्मै॒ पिपीष॑ते॒ विश्वा॑नि वि॒दुषे॑ भर। अ॒रं॒ग॒माय॒ जग्म॒येऽप॑श्चाद्दध्वने॒ नरे॑ ॥१॥

प्रति॑ । अ॒स्मै॒ । पिपी॑षते । विश्वा॑नि । वि॒दुषे॑ । भ॒र॒ । अ॒र॒म्ऽग॒माय॑ । जग्म॑ये । अप॑श्चात्ऽदघ्वने । नरे॑ ॥

Mantra without Swara
प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर। अरंगमाय जग्मयेऽपश्चाद्दध्वने नरे ॥

प्रति। अस्मै। पिपीषते। विश्वानि। विदुषे। भर। अरम्ऽगमाय। जग्मये। अपश्चात्ऽदध्वने। नरे ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! आप (जग्मये) विज्ञान की अधिकता के लिये (अपश्चाद्दध्वने) उत्तम व्यवहारों में आगे चलने तथा (अरङ्गमाय) विद्या के पार जाने और (पिपीषते) पान करने की इच्छा करनेवाले (विदुषे) यथार्थवक्ता विद्वान् के लिये और (अस्मै) इस (नरे) अग्रणी मनुष्य के लिये (विश्वानि) सम्पूर्ण उत्तम वस्तुओं को (भर) धारण करिये और यह भी आपके लिये इनको (प्रति) धारण करे ॥१॥
Essence
जो राजा विद्वानों के लिये सम्पूर्ण धन वा सामर्थ्य को धारण करता है और जो विद्वान् राजा आदि के हित के लिये प्रयत्न करते हैं, वे सर्वदा उन्नत होते हैं ॥१॥
Subject
अब चार ऋचावाले बयालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा वर्त्ताव करे, इस विषय को कहते हैं ॥