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Rigveda Mandal 6 / Sukta 41 / Mantra 5

75 Sukta
5 Mantra
6/41/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ह्वया॑मसि॒ त्वेन्द्र॑ याह्य॒र्वाङरं॑ ते॒ सोम॑स्त॒न्वे॑ भवाति। शत॑क्रतो मा॒दय॑स्वा सु॒तेषु॒ प्रास्माँ अ॑व॒ पृत॑नासु॒ प्र वि॒क्षु ॥५॥

ह्वया॑मसि । त्वा॒ । आ । इ॒न्द्र॒ । या॒हि॒ । अ॒र्वाङ् । अर॑म् । ते॒ । सोमः॑ । त॒न्वे॑ । भ॒वा॒ति॒ । शत॑क्रतो॒ इति॒ शत॑ऽक्रतो । मा॒दय॑स्व । सु॒तेषु॑ । प्र । अ॒स्मान् । अ॒व॒ । पृत॑नासु । प्र । वि॒क्षु ॥

Mantra without Swara
ह्वयामसि त्वेन्द्र याह्यर्वाङरं ते सोमस्तन्वे भवाति। शतक्रतो मादयस्वा सुतेषु प्रास्माँ अव पृतनासु प्र विक्षु ॥

ह्वयामसि। त्वा। आ। इन्द्र। याहि। अर्वाङ्। अरम्। ते। सोमः। तन्वे। भवाति। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। मादयस्व। सुतेषु। प्र। अस्मान्। अव। पृतनासु। प्र। विक्षु ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शतक्रतो) असङ्ख्य बुद्धियुक्त तथा उत्तम कर्म्म करने और (इन्द्र) सब प्रकार से रक्षा करनेवाले (ते) आपके (तन्वे) शरीर के लिये जो (सोमः) बड़ी ओषधि आदि का रस (अर्वाङ्) नीचे चलनेवाला (प्र, भवति) प्रभाव को प्राप्त होता है उसको आप (याहि) प्राप्त हूजिये और जिन (त्वा) आपको हम लोग (आ, ह्वयामसि) पुकारते हैं वह आप (सुतेषु) उत्पन्न हुए ऐश्वर्य्यों में (अस्मान्) हम लोगों की (प्र, अव) उत्तम प्रकार रक्षा करो और (पृतनासु) मनुष्यों वा सेनाओं में और (विक्षु) प्रजाओं में (अरम्) अच्छे प्रकार (मादयस्वा) आनन्द करो वा आनन्द कराओ ॥५॥
Essence
जो राजा अपने ऐश्वर्य्य से सम्पूर्ण प्रजाओं की न्याय से रक्षा करता है, वह प्रशंसित, अधिक अवस्थावाला और आनन्दयुक्त वा आनन्द करानेवाला भी होता है ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा और सोम के रस का गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह इकतालीसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वह कैसा हुआ क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥