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Rigveda Mandal 6 / Sukta 41 / Mantra 1

75 Sukta
5 Mantra
6/41/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अहे॑ळमान॒ उप॑ याहि य॒ज्ञं तुभ्यं॑ पवन्त॒ इन्द॑वः सु॒तासः॑। गावो॒ न व॑ज्रि॒न्त्स्वमोको॒ अच्छेन्द्रा ग॑हि प्रथ॒मो य॒ज्ञिया॑नाम् ॥१॥

अहे॑ळमानः । उप॑ । या॒हि॒ । य॒ज्ञम् । तुभ्य॑म् । प॒व॒न्ते॒ । इन्द॑वः । सु॒तासः॑ । गावः॑ । न । वा॒ज्रि॒न् । स्वम् । ओकः॑ । अच्छ॑ । इन्द्र॑ । आ । ग॒हि॒ । प्र॒थ॒मः । य॒ज्ञिया॑नाम् ॥

Mantra without Swara
अहेळमान उप याहि यज्ञं तुभ्यं पवन्त इन्दवः सुतासः। गावो न वज्रिन्त्स्वमोको अच्छेन्द्रा गहि प्रथमो यज्ञियानाम् ॥

अहेळमानः। उप। याहि। यज्ञम्। तुभ्यम्। पवन्ते। इन्दवः। सुतासः। गावः। न। वाज्रिन्। स्वम्। ओकः। अच्छ। इन्द्र। आ। गहि। प्रथमः। यज्ञियानाम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वज्रिन्) शस्त्र और अस्त्र को धारण करने और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले (यज्ञियानाम्) यज्ञ का पालन करने के योग्यों का (प्रथमः) पहिला (अहेळमानः) सत्कार किया गया जिस (यज्ञम्) आहार-विहार नामक यज्ञ को (तुभ्यम्) आपके लिये और (सुतासः) उत्पन्न किये गये (इन्दवः) सोमलता आदि के जल (पवन्ते) पवित्र करते हैं उसके (उप, याहि) समीप आइये और (गावः) गौवें (न) जैसे (स्वम्) अपने (ओकः) निवासस्थान को वैसे (अच्छ, आ, गहि) अच्छे प्रकार सब ओर से प्राप्त हूजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन् ! प्रजाजनों से उत्तम गुणों के योग के कारण सब से सत्कार किये गये राज्य-पालन नामक व्यवहार को यथावत् प्राप्त हूजिये और जैसे गौवें अपने बछड़े और स्थानों को प्राप्त होती हैं, वैसे प्रजा के पालन के लिये विनय को प्राप्त हूजिये ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले एकतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥