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Rigveda Mandal 6 / Sukta 40 / Mantra 4

75 Sukta
5 Mantra
6/40/4
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ या॑हि॒ शश्व॑दुश॒ता य॑या॒थेन्द्र॑ म॒हा मन॑सा सोम॒पेय॑म्। उप॒ ब्रह्मा॑णि शृणव इ॒मा नोऽथा॑ ते य॒ज्ञस्त॒न्वे॒३॒॑ वयो॑ धात् ॥४॥

आ । या॒हि॒ । शश्व॑त् । उ॒श॒ता । य॒या॒थ॒ । इन्द्र॑ । म॒हा । मन॑सा । सो॒म॒ऽपेय॑म् । उप॑ । ब्रह्मा॑णि । शृ॒ण॒वः॒ । इ॒मा । नः॒ । अथ॑ । ते॒ । य॒ज्ञः । त॒न्वे॑ । वयः॑ । धा॒त् ॥

Mantra without Swara
आ याहि शश्वदुशता ययाथेन्द्र महा मनसा सोमपेयम्। उप ब्रह्माणि शृणव इमा नोऽथा ते यज्ञस्तन्वे३ वयो धात् ॥

आ। याहि। शश्वत्। उशता। ययाथ। इन्द्र। महा। मनसा। सोमऽपेयम्। उप। ब्रह्माणि। शृणवः। इमा। नः। अथ। ते। यज्ञः। तन्वे। वयः। धात् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 12 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त धन के देनेवाले ! जो (यज्ञः) सद्विद्या और व्यवहार को बढ़ानेवाला व्यवहार (नः) हम लोगों के और (ते) आपके (तन्वे) शरीर के लिये (वयः) जीवन को (धात्) धारण करता है उससे (अथा) इसके अनन्तर (इमा) इन (ब्रह्माणि) धनों को वेदों को आप (महा) बड़े (मनसा) विज्ञानयुक्त चित्त से (उशता) कामना करते हुए विद्वान् के साथ (शृणवः) सुनिये और (शश्वत्) निरन्तर (ययाथ) प्राप्त हूजिये तथा (सोमपेयम्) पीने योग्य सोमलता के रस को पीने के लिये (उप, आ, याहि) समीप प्राप्त हूजिये ॥४॥
Essence
हे विद्वान् राजा आदि जनो ! आप लोग विद्वानों के साथ मेल कर, बुद्धि और बल के बढ़ानेवाले आहार और विहार को कर, परस्पर विचार करके ब्रह्मचर्य्य आदि से अवस्था को बढ़ावें, जिससे सब महाशय आप्त होवें ॥४॥
Subject
फिर राजा आदिकों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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