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Rigveda Mandal 6 / Sukta 40 / Mantra 2

75 Sukta
5 Mantra
6/40/2
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अस्य॑ पिब॒ यस्य॑ जज्ञा॒न इ॑न्द्र॒ मदा॑य॒ क्रत्वे॒ अपि॑बो विरप्शिन्। तमु॑ ते॒ गावो॒ नर॒ आपो॒ अद्रि॒रिन्दुं॒ सम॑ह्यन्पी॒तये॒ सम॑स्मै ॥२॥

अस्य॑ । पि॒ब॒ । यस्य॑ । ज॒ज्ञ॒नः । न्द्र॒ । मदा॑य । क्रत्वे॑ । अपि॑बः । वि॒ऽर॒प्शि॒न् । तम् । ऊँ॒ इति॑ । ते॒ । गावः॑ । नरः॑ । आपः॑ । अद्रिः॑ । इन्दु॑म् । सम् । अ॒ह्य॒न् । पी॒तये॑ । सम् । अ॒स्मै॒ ॥

Mantra without Swara
अस्य पिब यस्य जज्ञान इन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन्। तमु ते गावो नर आपो अद्रिरिन्दुं समह्यन्पीतये समस्मै ॥

अस्य। पिब। यस्य। जज्ञनः। इन्द्र। मदाय। क्रत्वे। अपिबः। विऽरप्शिन्। तम्। ऊँ इति। ते। गावः। नरः। आपः। अद्रिः। इन्दुम्। सम्। अह्यन्। पीतये। सम्। अस्मै ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 12 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विरप्शिन्) बड़े गुण से विशिष्ट (इन्द्र) राजन् ! (यस्य) जिस (अस्य) इसके (मदाय) आनन्द देनेवाले (क्रत्वे) प्रज्ञान के लिये रस को (अपिबः) पान किया उस रस को आप फिर (जज्ञानः) प्रसिद्ध होते हुए (पिब) पान करिये और जिन (ते) आपके (गावः) किरणों के सदृश (नरः) मनुष्य और (आपः) जल और (अद्रिः) मेघ (इन्दुम्) जल को जैसे वैसे (तम्, उ) उसको ही प्राप्त होते हैं और (अस्मै) इस (पीतये) पान के लिये (सम्, अह्यन्) अच्छे प्रकार व्याप्त होते हुए आप (सम्) उत्तम प्रकार पान करिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जिस भोजन और पान से बुद्धि और बल बढ़े, उसका भोजन और उसका पान करिए और उसका भोजन और पान कराइये और उसका पान न करिये और न कराइये, जिससे बुद्धिभ्रंश होवे ॥२॥
Subject
अब मनुष्यों को क्या खाना और क्या पीना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥