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Rigveda Mandal 6 / Sukta 40 / Mantra 1

75 Sukta
5 Mantra
6/40/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ पिब॒ तुभ्यं॑ सु॒तो मदा॒याव॑ स्य॒ हरी॒ वि मु॑चा॒ सखा॑या। उ॒त प्र गा॑य ग॒ण आ नि॒षद्याथा॑ य॒ज्ञाय॑ गृण॒ते वयो॑ धाः ॥१॥

इन्द्र॑ । पिब॑ । तुभ्य॑म् । सु॒तः । मदा॑य । अव॑ । स्य॒ । हरी॒ इति॑ । वि । मु॒च॒ । सखा॑या । उ॒त । प्र । गा॒य॒ । ग॒णे । आ । नि॒ऽसद्य । अथ॑ । य॒ज्ञाय॑ । गृ॒ण॒ते । वयः॑ । धाः॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायाव स्य हरी वि मुचा सखाया। उत प्र गाय गण आ निषद्याथा यज्ञाय गृणते वयो धाः ॥

इन्द्र। पिब। तुभ्यम्। सुतः। मदाय। अव। स्य। हरी इति। वि। मुच। सखाया। उत। प्र। गाय। गणे। आ। निऽसद्य। अथ। यज्ञाय। गृणते। वयः। धाः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 12 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) राजन् ! जो (तुभ्यम्) आपके लिये (मदाय) हर्ष के अर्थ (सुतः) उत्पन्न किया गया सोमलता का रस है उसको (पिब) पीजिये उससे (अव, स्य) विनाश को अन्त करिये अर्थात् निश्चित रहिये और (उत) भी (हरी) संयुक्त घोड़ों के सदृश वर्त्तमान राजा और प्रजाजन (वि, मुचा) जो कि दुःख का त्याग करनेवाले (सखाया) मित्र होते हुए हैं, उनकी (प्र, गाय) स्तुति करिये और (गणे) गणना करने योग्य विद्वानों के समूह में (निषद्य) स्थित होकर (अथा) इसके अनन्तर (गृणते) सत्यविद्या और धर्म की प्रशंसा करनेवाले के लिये तथा (यज्ञाय) सत्य से संयुक्त होनेवाले के लिये (वयः) कामना करने योग्य अवस्था को (आ) सब प्रकार से (धाः) धारण कीजिये ॥१॥
Essence
हे राजन् ! आप सोमलता आदि बड़ी ओषधियों के रस का पान कर, रोगरहित होकर, सत्य और असत्य का निर्णय कर, सब मित्रों की स्तुति करके, विद्वानों की सभा में स्थित होकर और सत्य, न्याय का प्रचार करके, दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से विद्याग्रहण के लिये सम्पूर्ण बालिका और बालकों को प्रवृत्त कराके सम्पूर्ण प्रजाओं को अधिक अवस्थावाली करिये ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले चालीसवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥