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Rigveda Mandal 6 / Sukta 4 / Mantra 3

75 Sukta
8 Mantra
6/4/3
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्यावो॒ न यस्य॑ प॒नय॒न्त्यभ्वं॒ भासां॑सि वस्ते॒ सूर्यो॒ न शु॒क्रः। वि य इ॒नोत्य॒जरः॑ पाव॒कोऽश्न॑स्य चिच्छिश्नथत्पू॒र्व्याणि॑ ॥३॥

द्यावः॑ । न । यस्य॑ । प॒नय॑न्ति । अभ्व॑म् । भासां॑सि । व॒स्ते॒ । सूर्यः॑ । न । शु॒क्रः । वि । यः । इ॒नोति॑ । अ॒जरः॑ । पा॒व॒कः । अश्न॑स्य । चि॒त् । शि॒श्न॒थ॒त् । पू॒र्व्याणि॑ ॥

Mantra without Swara
द्यावो न यस्य पनयन्त्यभ्वं भासांसि वस्ते सूर्यो न शुक्रः। वि य इनोत्यजरः पावकोऽश्नस्य चिच्छिश्नथत्पूर्व्याणि ॥

द्यावः। न। यस्य। पनयन्ति। अभ्वम्। भासांसि। वस्ते। सूर्यः। न। शुक्रः। वि। यः। इनोति। अजरः। पावकः। अश्नस्य। चित्। शिश्नथत्। पूर्व्याणि ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (द्यावः) कामना करते हुए विद्वान् जन (न) जैसे वैसे जन (यस्य) जिस परमेश्वर की (अभ्वम्) बड़ी महिमा की (पनयन्ति) स्तुति कराते हैं और (सूर्य्यः) सूर्य्य (न) जैसे वैसे (शुक्रः) शुद्ध, पवित्र वा बलिष्ठ जन (भासांसि) तेजों को (वस्ते) आच्छादित करता है और (यः) जो (अजरः) जरादोष से रहित (पावकः) पवित्र और सब को पवित्र करनेवाला (वि, इनोति) विशेष व्याप्त होता है और (अश्नस्य) व्यापक के मध्य में (पूर्व्याणि) पहिले निर्मित वस्तुओं का (चित्) भी (शिश्नथत्) प्रलय करता है, वही जगदीश्वर जानने योग्य है ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो परमेश्वर प्रकाशकों का प्रकाशक, नित्यों का नित्य और चेतनों का चेतन है, उसी का भजन करो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥