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Rigveda Mandal 6 / Sukta 4 / Mantra 2

75 Sukta
8 Mantra
6/4/2
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स नो॑ वि॒भावा॑ च॒क्षणि॒र्न वस्तो॑र॒ग्निर्व॒न्दारु॒ वेद्य॒श्चनो॑ धात्। वि॒श्वायु॒र्यो अ॒मृतो॒ मर्त्ये॑षूष॒र्भुद्भूदति॑थिर्जा॒तवे॑दाः ॥२॥

सः । नः॒ । वि॒भाऽवा॑ । च॒क्षणिः॑ । न । वस्तोः॑ । अ॒ग्निः । व॒न्दारु॑ । वेद्यः॑ । चनः॑ । धा॒त् । वि॒श्वऽआ॑युः । यः । अ॒मृतः॑ । मर्त्ये॑षु । उ॒षः॒ऽभुत् । भूत् । अति॑थिः । जा॒तऽवे॑दाः ॥

Mantra without Swara
स नो विभावा चक्षणिर्न वस्तोरग्निर्वन्दारु वेद्यश्चनो धात्। विश्वायुर्यो अमृतो मर्त्येषूषर्भुद्भूदतिथिर्जातवेदाः ॥

सः। नः। विभाऽवा। चक्षणिः। न। वस्तोः। अग्निः। वन्दारु। वेद्यः। चनः। धात्। विश्वऽआयुः। यः। अमृतः। मर्त्येषु। उषःऽभुत्। भूत्। अतिथिः। जातऽवेदाः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (वस्तोः) दिन और (चक्षणिः) प्रकाशक सूर्य और (अग्निः) अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशयुक्त (न) जैसे वैसे (नः) हम लोगों के बीच (विभावा) अत्यन्त प्रकाशवाला और (वेद्यः) जानने योग्य (विश्वायुः) पूर्णावस्थावाला (मर्त्येषु) मरणधर्मयुक्त मनुष्यों में (अमृतः) नाशरहित और (उषर्भुत्) प्रातःकाल में जाना जाता है ऐसा और (अतिथिः) जिसके प्राप्त होने की कोई तिथि विद्यमान नहीं उसके समान वर्त्तमान और (जातवेदाः) उत्पन्न हुओं में विद्यमान वा उत्पन्न हुए पदार्थों को जाननेवाला (वन्दारु) प्रशंसा करने योग्य (चनः) अन्न आदि को (धात्) धारण करता है (सः) वह परमेश्वर हम लोगों का मङ्गल करनेवाला (भूत्) हो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सूर्य्य के सदृश अपने से प्रकाशित, जानने योग्य, अजर, अमर, अतिथि के सदृश सत्कार करने योग्य और सर्वत्र व्याप्त है, उसकी सब उपासना करें ॥२॥
Subject
फिर जगदीश्वर कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥