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Rigveda Mandal 6 / Sukta 39 / Mantra 3

75 Sukta
5 Mantra
6/39/3
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं द्यो॑तयद॒द्युतो॒ व्य१॒॑क्तून्दो॒षा वस्तोः॑ श॒रद॒ इन्दु॑रिन्द्र। इ॒मं के॒तुम॑दधु॒र्नू चि॒दह्नां॒ शुचि॑जन्मन उ॒षस॑श्चकार ॥३॥

अ॒यम् । द्यो॒त॒य॒त् । अ॒द्युतः॑ । वि । अ॒क्तून् । दो॒षा । वस्तोः॑ । श॒रदः॑ । इन्दुः॑ । इ॒न्द्र॒ । इ॒मम् । के॒तुम् । अ॒द॒धुः॒ । नु । चि॒त् । अह्ना॑म् । शुचि॑ऽजन्मनः । उ॒षसः॑ । च॒का॒र॒ ॥

Mantra without Swara
अयं द्योतयदद्युतो व्य१क्तून्दोषा वस्तोः शरद इन्दुरिन्द्र। इमं केतुमदधुर्नू चिदह्नां शुचिजन्मन उषसश्चकार ॥

अयम्। द्योतयत्। अद्युतः। वि। अक्तून्। दोषा। वस्तोः। शरदः। इन्दुः। इन्द्र। इमम्। केतुम्। अदधुः। नु। चित्। अह्नाम्। शुचिऽजन्मनः। उषसः। चकार ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 11 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान विद्वन् ! जैसे (अयम्) यह (इन्दुः) गीला करनेवाला सूर्य्य (अद्युतः) नहीं प्रकाश करनेवाले भूमि आदिकों को और (अक्तून्) रात्रियों को (दोषा) प्रभातकालों को (वस्तोः) दिन को (शरदः) शरद् आदि ऋतुओं को (वि, द्योतयत्) प्रकाशित करता है और (अह्नाम्) दिनों के (चित्) भी (शुचिजन्मनः) सूर्य्य से जन्म जिसका उस (उषसः) प्रभात वेला की प्रकटता को (चकार) करता है, वैसे (इमम्) इस (केतुम्) बुद्धि को प्रकाशित कीजिये और जैसे इस प्रकाशस्वरूप सूर्य्य को प्रभात वेलायें (अदधुः) धारण करें, वैसे (नू) शीघ्र विद्या के प्रकाश को धारण करिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो ! आप लोग जैसे सूर्य्य, अप्रकाशक भूमि आदि का प्रकाश करने और आनन्द करनेवाला पवित्र क्षण आदि समयों का निर्म्माण करता है, वैसे मनुष्यों के आत्माओं के प्रकाशक हुए विद्या की वृद्धि करनेवाले कर्म्मों को निष्पन्न कीजिये और कर्मों का प्रचार कराइये ॥३॥
Subject
फिर विद्वान् जन कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥