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Rigveda Mandal 6 / Sukta 38 / Mantra 3

75 Sukta
5 Mantra
6/38/3
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तं वो॑ धि॒या प॑र॒मया॑ पुरा॒जाम॒जर॒मिन्द्र॑म॒भ्य॑नूष्य॒र्कैः। ब्रह्मा॑ च॒ गिरो॑ दधि॒रे सम॑स्मिन्म॒हांश्च॒ स्तोमो॒ अधि॑ वर्ध॒दिन्द्रे॑ ॥३॥

तम् । वः॒ । धि॒या । प॒र॒मया॑ । पु॒रा॒ऽजाम् । अ॒जर॑म् । इन्द्र॑म् । अ॒भि । अ॒नू॒षि॒ । अ॒र्कैः । ब्रह्म॑ । च॒ । गिरः॑ । द॒धि॒रे । सम् । अ॒स्मि॒न् । म॒हान् । च॒ । स्तोमः॑ । अधि॑ । व॒र्ध॒त् । इन्द्रे॑ ॥

Mantra without Swara
तं वो धिया परमया पुराजामजरमिन्द्रमभ्यनूष्यर्कैः। ब्रह्मा च गिरो दधिरे समस्मिन्महांश्च स्तोमो अधि वर्धदिन्द्रे ॥

तम्। वः। धिया। परमया। पुराऽजाम्। अजरम्। इन्द्रम्। अभि। अनूषि। अर्कैः। ब्रह्म। च। गिरः। दधिरे। सम्। अस्मिन्। महान्। च। स्तोमः। अधि। वर्धत्। इन्द्रे ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वानो ! जैसे तुम (ब्रह्मा) वेद की और (वः) आप लोगों की (परमया) अत्यन्त उत्तम (धिया) बुद्धि वा कर्म से (तम्) उस (पुराजाम्) पहिले प्रकट हुए (अजरम्) जीर्ण होने से रहित (इन्द्रम्) बिजुली की भी प्रशंसा करो, वैसे (अर्कैः) सूर्य्यों से मैं इसकी (अभि, अनूषि) स्तुति करता हूँ और जैसे (च) भी (अस्मिन्) इस (इन्द्रे) अत्यन्त ऐश्वर्य्य में (च) भी (महान्) बड़ा (स्तोमः) प्रशंसा करने योग्य गुण कर्म्म, और स्वभाववाला (अधि, वर्धत्) बढ़ता है और जैसे आप विद्वानों की (गिरः) वेदवाणियों को (सम्) (दधिरे) उत्तम प्रकार धारण करते हैं, वैसे हम लोग अनुष्ठान करें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों के उपदेश और पुरुषार्थ से बिजुली आदि की विद्यायुक्त बुद्धि की स्वीकार करते हैं, वे यहाँ स्तुति करने योग्य होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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